500 stray dogs poisoned Telangana: कांग्रेस शासित तेलंगाना में 500 कुत्ते मरे… नेतृत्व क्यों चुप है?
500 stray dogs poisoned Telangana: तेलंगाना से आई यह खबर किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली है। पंचायत चुनाव खत्म होते ही राज्य के अलग-अलग गांवों में करीब 500 आवारा कुत्तों के मारे जाने के आरोप सामने आए हैं। कहीं जहर मिला खाना दिया गया, कहीं घातक इंजेक्शन लगाए गए, तो कहीं मौतों की वजह आज भी “रहस्यमयी” बताई जा रही है। जगहें अलग थीं, तरीके अलग थे, लेकिन नतीजा एक — सैकड़ों बेजुबानों की मौत।
कामारेड्डी और हनमकोंडा से शुरू हुई कहानी
कामारेड्डी और हनमकोंडा जिलों से सामने आए इन मामलों में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और फॉरेंसिक जांच जारी है। गांवों के बाहर दफन किए गए कुत्तों के शव अब सवाल बनकर उभर रहे हैं। यह मामला सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो सत्ता में आते ही कानून को अपने हाथ में लेने लगती है।
चुनावी वादे और “समाधान” के नाम पर हत्या
पंचायत चुनाव के दौरान कुछ सरपंच उम्मीदवारों ने गांवों में बढ़ते आवारा कुत्तों को बड़ी समस्या बताया और उनसे “मुक्ति” दिलाने का वादा किया। लेकिन चुनाव जीतने के बाद जिस रास्ते को समाधान कहा गया, वह असल में हैवानियत का रास्ता था। महज एक हफ्ते के भीतर सैकड़ों कुत्तों को मौत के घाट उतार दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के साफ निर्देश, फिर भी अनदेखी
सबसे गंभीर बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है। कोर्ट साफ कह चुका है कि आवारा कुत्तों को मारना गैरकानूनी है। समाधान भी तय है — नसबंदी, टीकाकरण और फिर उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ना। या फिर पशु देखभाल केंद्र और कार्यशील वेटनरी क्लीनिक बनाना। हत्या कभी भी विकल्प नहीं रही, न कानून में, न इंसानियत में।
यह सिर्फ पशु क्रूरता नहीं, सिस्टम की नाकामी है
तेलंगाना की यह घटना बताती है कि जब चुनावी दबाव और लोकप्रियता की राजनीति हावी हो जाती है, तो सबसे पहले संवेदना कुचली जाती है। यह मामला सिर्फ पशु क्रूरता का नहीं है, बल्कि सिस्टम की नाकामी और सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण है।
संवेदना की राजनीति और नेताओं की चुप्पी
दिल्ली में जब सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के पक्ष में फैसला सुनाया था, तब कई नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर संवेदना दिखाई। उस वक्त राहुल गांधी अपने पालतू कुत्ते के साथ तस्वीरें साझा कर रहे थे। लेकिन आज, जब कांग्रेस शासित तेलंगाना में 500 से ज्यादा कुत्तों की हत्या के आरोप सामने आए हैं, वही आवाज़ खामोश क्यों है?
क्या करुणा राज्य बदलते ही बदल जाती है?
यह सवाल अब आम लोगों के मन में है। क्या करुणा सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित है? क्या बेजुबानों की जान की कीमत दिल्ली और तेलंगाना में अलग-अलग है? और क्या राजनीतिक चुप्पी भी एक तरह की जिम्मेदारी से बचने का तरीका नहीं है?
लोकतंत्र में वोट से बड़ी होती है जिंदगी
यह बहस कुत्तों और इंसानों के बीच नहीं है। यह बहस जिम्मेदार प्रशासन और आसान हिंसक समाधान के बीच है। आज तेलंगाना के गांवों में दफन किए गए ये 500 कुत्ते सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं। ये उस सिस्टम पर सवाल हैं, जो वोट के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
आखिरी सवाल, जो अनसुना नहीं होना चाहिए
अब सवाल सिर्फ इतना है —
क्या चुनाव जीतने के लिए किसी बेजुबान की जान लेना जायज हो सकता है?
और अगर नहीं, तो इस सवाल का जवाब देगा कौन — अदालत, सरकार या हम सब?
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