Indore drinking water tragedy: स्वच्छ शहर इंदौर में जहरीला पानी! मल-मूत्र मिले जल से 14 मौतें, सिस्टम बेनकाब
Indore drinking water tragedy: देश को जब भी स्वच्छता की मिसाल दी जाती है, तो सबसे पहले नाम आता है इंदौर का। लेकिन इसी शहर से आई एक खबर ने न सिर्फ प्रशासन, बल्कि पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। भागीरथपुरा इलाके में नर्मदा जल सप्लाई के नाम पर लोगों को जो पानी पिलाया गया, वह साफ नहीं बल्कि मानव मल-मूत्र से दूषित था। इस भयावह लापरवाही की कीमत अब तक 14 लोगों की जान के रूप में सामने आ चुकी है।
पानी नहीं, जहर बन गया जीवन का सहारा
सोमवार को जब भागीरथपुरा में अचानक उल्टी-दस्त के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि मामला इतना गंभीर होगा। कुछ ही घंटों में मोहल्ले के 100 से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक अस्पतालों में लाइन लग गई। अगले दिन हालात और बिगड़ गए—एक के बाद एक आठ मौतें हो गईं। अब तक करीब 2800 मरीज सामने आ चुके हैं।
एमजीएम मेडिकल कॉलेज और नगर निगम की लैब जांच में जो सच सामने आया, उसने सबको हिला दिया। पानी में ई-कोलाई और शिगेला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए, जो सीधे तौर पर मानव मल में होते हैं। यानी लोगों को अनजाने में जहरीला पानी पिलाया जा रहा था।
ICU में जिंदगी और मौत की लड़ाई
इस हादसे में सिर्फ मौतें ही नहीं हुईं, बल्कि कई लोग अब भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। 32 मरीज ICU में भर्ती हैं, जिनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। कई परिवार ऐसे हैं, जिनके घर में एक साथ तीन-चार लोग बीमार पड़े हैं। रोजमर्रा की जिंदगी अचानक ठहर सी गई है—काम, स्कूल, सब कुछ पीछे छूट गया है, बस एक ही डर है, “अगला नंबर किसका?”
शिकायतें होती रहीं, सुनने वाला कोई नहीं
सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्थानीय लोगों का कहना है कि दूषित पानी की शिकायतें पहले से की जा रही थीं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अगर शुरुआती शिकायतों पर ध्यान दिया जाता, तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी टाली जा सकती थी।
मुआवजे के बीच गुस्सा और सवाल
कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जब मृतकों के परिवारों को दो-दो लाख रुपये की सहायता राशि देने पहुंचे, तो उन्हें लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। परिजनों का कहना था कि प्रशासन वास्तविक मौतों की संख्या कम बता रहा है। खुद मंत्री ने भी माना कि डायरिया से हुई मौतों की संख्या अधिक हो सकती है और जांच के बाद सभी को सहायता दी जाएगी।
मानवाधिकार आयोग और हाईकोर्ट की नजर
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। वहीं, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में इस मामले को लेकर जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं, जिन पर सरकार को स्टेटस रिपोर्ट पेश करनी है।
सिर्फ हादसा नहीं, सिस्टम की विफलता
यह मामला सिर्फ एक इलाके की गलती नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। सवाल यह नहीं है कि पानी कैसे दूषित हुआ, बल्कि यह है कि जांच, निगरानी और जवाबदेही कहां थी? जिस शहर को स्वच्छता का मॉडल माना जाता है, वहां अगर लोग पीने के पानी से मरने लगें, तो यह चेतावनी है।
आगे क्या?
अब जरूरत है सिर्फ जांच और मुआवजे की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और स्थायी समाधान की। दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, जल सप्लाई सिस्टम की पूरी ऑडिट हो और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसकी गारंटी दी जाए।
क्योंकि पानी सिर्फ जरूरत नहीं, जीवन है—और जीवन के साथ ऐसी लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती।
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