
S Jaishankar Bangladesh visit: भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश इस समय बड़े राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सत्ता का संतुलन बदल चुका है, पुराने समीकरण टूट रहे हैं और नए चेहरे उभर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत सरकार के हालिया कदमों ने सबका ध्यान खींचा है। एक तरफ विदेश मंत्री एस. जयशंकर का अचानक ढाका जाना, दूसरी तरफ दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बांग्लादेश उच्चायोग पहुंचना—इन दोनों घटनाओं को सिर्फ संयोग मानना मुश्किल है।
Khaleda Zia death India response
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के बाद भारत ने जो रुख अपनाया, वह कूटनीति के लिहाज से खास माना जा रहा है। जयशंकर का 31 दिसंबर 2025 को ढाका पहुंचना सिर्फ एक शोक यात्रा नहीं था, बल्कि एक संदेश भी था। उन्होंने खालिदा जिया के बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान से मुलाकात कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी शोक पत्र सौंपा।
भारत की तरफ से यह साफ इशारा था कि वह बांग्लादेश की बदलती राजनीति को गंभीरता से देख रहा है और पुराने टैग से आगे बढ़ना चाहता है।
क्यों अहम है यह पहल?
अब तक एक आम धारणा रही है कि भारत की दोस्ती सिर्फ शेख हसीना और उनकी अवामी लीग तक सीमित है। लेकिन हालात बदल चुके हैं। शेख हसीना देश से बाहर हैं, उनकी पार्टी पर चुनाव लड़ने का प्रतिबंध है और फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों में BNP की जीत लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सिर्फ पुराने रिश्तों पर निर्भर न रहे।
जयशंकर का तारिक रहमान से मिलना इस बात का संकेत है कि भारत अब भविष्य की सत्ता से संवाद बना रहा है—वो भी बिना शोर-शराबे के।
राजनाथ सिंह का कदम क्यों खास?
इसी कड़ी में दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बांग्लादेश हाई कमीशन पहुंचना भी अहम माना जा रहा है। परंपरा के तहत शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करना औपचारिक जरूर है, लेकिन इतने वरिष्ठ स्तर पर ऐसा कदम उठाना यह दिखाता है कि भारत सिर्फ शब्दों में नहीं, कर्म में भी संदेश देना चाहता है।
यह साफ किया गया कि भारत बांग्लादेश के लोगों के साथ खड़ा है, न कि किसी एक गुट के खिलाफ या पक्ष में।
भारत की दोहरी चिंता
भारत की चिंता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। बीते महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों के मजबूत होने और अल्पसंख्यक, खासकर हिंदुओं पर हमलों की खबरें सामने आई हैं। अंतरिम सरकार के दौर में जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे भारत की सुरक्षा एजेंसियां भी सतर्क हैं।
भारत नहीं चाहता कि बांग्लादेश फिर से ऐसे रास्ते पर जाए, जहां कट्टरपंथ और पाकिस्तान समर्थित ताकतों को खुली छूट मिले। सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक संतुलन—ये सभी भारत के लिए सीधे जुड़े मुद्दे हैं।
‘खामोश एजेंडा’ क्या है?
भारत का मौजूदा रुख साफ दिखता है:
- वह बांग्लादेश में लोकतांत्रिक और नरमपंथी नेतृत्व को समर्थन देना चाहता है।
- किसी एक पार्टी की बजाय पूरे देश और सरकार से संबंध रखना चाहता है।
- कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों को सत्ता के केंद्र से दूर रखने का संकेत दे रहा है।
- बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान और मुक्ति संग्राम की विरासत को बचाए रखने के पक्ष में है।
आगे क्या?
जयशंकर और राजनाथ सिंह के कदम यह बताते हैं कि भारत अब रिएक्टिव नहीं, प्रो-एक्टिव डिप्लोमेसी अपना रहा है। बिना किसी बड़े बयान या टकराव के, भारत बांग्लादेश में बदलते हालात के हिसाब से अपने पत्ते सधी चाल से चल रहा है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ शोक नहीं था—यह भविष्य की रणनीति की शुरुआत थी।
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