Dr Rashmi Verma death case: डॉक्टर भी टूट जाते हैं! एम्स भोपाल में सिस्टम की मार से गई डॉक्टर रश्मि की जान
Dr Rashmi Verma death case: एम्स भोपाल के इमरजेंसी और ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा की मौत ने पूरे मेडिकल समुदाय को गहरे सदमे में डाल दिया है। 11 दिसंबर को आत्महत्या का प्रयास करने के बाद वे लगातार 24 दिनों तक AIIMS भोपाल के मेन आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं।
5 जनवरी 2026, सोमवार सुबह करीब 11 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। इसके बाद उनका शव परिजनों को सौंप दिया गया।
क्या हुआ था 11 दिसंबर को?
11 दिसंबर 2025 को डॉ. रश्मि ने घर पर बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) का हाई डोज इंजेक्ट कर लिया। उनके पति, डॉ. मनमोहन शाक्य, उन्हें तुरंत एम्स लेकर पहुंचे, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले करीब 25 मिनट बीत चुके थे।
डॉक्टरों के मुताबिक, इस दौरान उनका दिल लगभग 7 मिनट तक नहीं धड़का। इमरजेंसी में सीपीआर और तीन बार रेससिटेशन के बाद हार्टबीट तो लौट आई, लेकिन दिमाग को लंबे समय तक ऑक्सीजन न मिलने से स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी।
MRI में सामने आई कड़वी सच्चाई
72 घंटे बाद हुई एमआरआई में ‘ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन’ की पुष्टि हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में दिमाग को स्थायी नुकसान हो जाता है और रिकवरी की संभावना लगभग न के बराबर होती है।
यहीं से यह साफ हो गया था कि डॉ. रश्मि की हालत में सुधार की उम्मीद बहुत कम है, फिर भी परिवार और सहकर्मी चमत्कार की आस लगाए रहे।
सिर्फ एक मौत नहीं, सिस्टम पर सवाल
डॉ. रश्मि की मौत को केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह मामला मेडिकल संस्थानों में बढ़ते टॉक्सिक वर्क कल्चर, प्रशासनिक दबाव और डॉक्टरों की मेंटल हेल्थ की अनदेखी को सामने लाता है।
घटना के बाद एम्स के अंदरूनी सिस्टम, विभागीय नोटिस और कथित हैरासमेंट को लेकर गंभीर सवाल उठे। कहा गया कि लगातार दबाव और अपमान ने एक होनहार डॉक्टर को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक्शन, लेकिन क्या काफी?
मामला सामने आने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने त्वरित कार्रवाई करते हुए संबंधित विभागाध्यक्ष (HOD) को हटा दिया और विभाग को दो हिस्सों में बांट दिया।
एक हाई-लेवल कमेटी भी बनाई गई, लेकिन अब तक उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रशासनिक बदलाव काफी नहीं हैं। जब तक काम का माहौल नहीं बदलेगा, ऐसे मामले दोहराते रहेंगे।
एक समर्पित डॉक्टर, जो गरीबों के लिए जानी जाती थीं
डॉ. रश्मि वर्मा का मेडिकल सफर बेहद प्रेरणादायक था। उन्होंने
- MBBS: MLN मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज
- MD (जनरल मेडिसिन): BRD मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर
से पढ़ाई की थी।
वे LN मेडिकल कॉलेज और PMS भोपाल में भी सेवाएं दे चुकी थीं।
करीब 5 साल के टीचिंग अनुभव के साथ वे गरीब मरीजों की मदद और CPR ट्रेनिंग की नोडल अधिकारी के रूप में जानी जाती थीं। हाल ही में उन्हें उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा बेस्ट एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।
डॉक्टर भी इंसान होते हैं
यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि डॉक्टर सिर्फ इलाज करने वाली मशीन नहीं होते। वे भी इंसान हैं, जिनकी अपनी मानसिक सीमाएं होती हैं।
मेडिकल फील्ड में लंबे घंटे, लगातार दबाव, सीनियर-जूनियर राजनीति और संवेदनहीन सिस्टम डॉक्टरों को अंदर से तोड़ देता है। दुख की बात यह है कि जब डॉक्टर खुद मदद के मोहताज होते हैं, तब उनके लिए मेंटल हेल्थ सपोर्ट लगभग न के बराबर होता है।
सोशल मीडिया पर उठा इंसाफ का सवाल
डॉ. रश्मि की मौत के बाद सोशल मीडिया पर #JusticeForDrRashmi ट्रेंड कर रहा है। देशभर के डॉक्टर, मेडिकल स्टूडेंट्स और सहकर्मी टॉक्सिक वर्क कल्चर के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।
लोग सवाल पूछ रहे हैं—क्या हम अपने सबसे ज़रूरी योद्धाओं को बचा पा रहे हैं?
केस की पूरी टाइमलाइन
- 11 दिसंबर 2025: हाई-डोज एनेस्थीसिया लेकर आत्महत्या का प्रयास
- उसी दिन: AIIMS पहुंचाया गया, 7 मिनट हार्ट अरेस्ट
- 12 दिसंबर: ICU में वेंटिलेटर, ब्रेन डैमेज कन्फर्म
- 14 दिसंबर: HOD हटाए गए, कमेटी गठित
- 5 जनवरी 2026: 24 दिन बाद मौत
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