Son preference in India: 10 बेटियों के बाद बेटा, 11वीं डिलीवरी और समाज का कड़वा सच
Son preference in India: हरियाणा के फतेहाबाद जिले से आई एक खबर ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। भूना ब्लॉक के ढाणी भोजराज गांव में रहने वाले एक मजदूर परिवार में 11वीं संतान का जन्म हुआ। इस बार परिवार को बेटा हुआ है, जबकि इससे पहले महिला 10 बेटियों को जन्म दे चुकी है। बेटे के जन्म पर गांव में लड्डू बांटे गए, डीजे बजा और जश्न मनाया गया।
लेकिन यह कहानी सिर्फ खुशी की नहीं है, बल्कि इसमें कई ऐसे सवाल छुपे हैं, जो आज के समाज की सोच को उजागर करते हैं।
महिला ने 4 जनवरी को जींद के उचाना स्थित एक निजी अस्पताल में बेटे को जन्म दिया। डिलीवरी आसान नहीं थी। डॉक्टरों के अनुसार, यह एक हाई रिस्क प्रेग्नेंसी थी, क्योंकि महिला के शरीर में खून की मात्रा बेहद कम थी। इसके बावजूद नॉर्मल डिलीवरी कराई गई और मां व बच्चा दोनों सुरक्षित हैं। बच्चे का नाम ‘दिलखुश’ रखा गया है।
19 साल की शादी और 8 साल गर्भावस्था में
महिला की शादी 2007 में हुई थी। यानी 19 साल के वैवाहिक जीवन में वह करीब 8 साल गर्भावस्था में रही। लगातार गर्भधारण ने महिला के शरीर पर गहरा असर डाला। डॉक्टरों को डिलीवरी के दौरान खून चढ़ाना पड़ा।
आज के समय में चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बार गर्भधारण महिला के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। इससे न सिर्फ शारीरिक कमजोरी बढ़ती है, बल्कि जान का जोखिम भी कई गुना हो जाता है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इस मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे पुरुष प्रधान सोच का नतीजा बताया। उनका कहना था कि अगर पहली या दूसरी संतान बेटा होती, तो शायद परिवार वहीं रुक जाता।
एक यूजर ने लिखा कि पैसे न हों, तब भी बेटा चाहिए—यही सबसे बड़ी समस्या है।
वहीं कुछ लोगों ने महिला के प्रति सहानुभूति जताई और कहा कि आज भी कई महिलाएं अपने शरीर पर फैसला खुद नहीं ले पातीं।
कुछ प्रतिक्रियाएं तंज भरी भी रहीं। किसी ने कहा कि इस परिवार ने हरियाणा का गर्ल चाइल्ड रेशियो सुधार दिया। तो किसी ने इसे जनसंख्या बढ़ने से जोड़ते हुए चिंता जताई।
हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि कम से कम परिवार ने बेटियों को मारा नहीं और उन्हें पाल-पोस रहा है, जो अपने आप में बड़ी बात है।
पिता के बयान ने बढ़ाई चर्चा
पिता संजय दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उनका कहना है कि वे और उनकी पत्नी बेटा चाहते थे और अब भगवान की मर्जी से उन्हें बेटा मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं और लड़कियां आज किसी से कम नहीं हैं।
लेकिन एक वायरल वीडियो में जब उनसे बेटियों के नाम पूछे गए, तो वह अटकते नजर आए। इसी बात को लेकर कई लोग नाराज भी दिखे और सवाल उठाए कि क्या इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाना सही है।
बेटे की चाह या सामाजिक दबाव?
यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं है। यह उस सोच को दिखाता है, जहां आज भी बेटा परिवार की “पूर्ति” माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि बेटियां भी वही प्यार, वही सहारा और वही सम्मान देने में सक्षम हैं।
लगातार गर्भधारण से महिला का शरीर टूटता है, लेकिन समाज में इस दर्द पर कम और बेटे की खुशी पर ज्यादा बात होती है।
Women health issues India
2026 में भी अगर एक बेटे के लिए 10 बेटियों के बाद 11वीं बार गर्भधारण को सामान्य माना जा रहा है, तो यह सोचने का समय है। क्या बेटा-बेटी में फर्क अब भी हमारे फैसलों को चला रहा है? और क्या महिला की सेहत और उसकी सहमति से बड़ा कोई सामाजिक दबाव हो सकता है?
यह खबर हमें खुश होने से पहले सोचने पर मजबूर करती है। क्योंकि असली तरक्की जश्न में नहीं, सोच बदलने में है।
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