Mamata Banerjee vs ED: अगर छिपाने को कुछ नहीं था, तो ED रेड में दखल क्यों? कोयला घोटाला और चुनावी रण
Mamata Banerjee vs ED: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। इस बार विवाद के केंद्र में हैं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय। मामला जुड़ा है राजनीतिक रणनीति बनाने वाली संस्था I-PAC से, जो तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करती रही है। ईडी की छापेमारी और उसके बाद लगाए गए आरोपों ने इस जांच को एक बड़े राजनीतिक टकराव में बदल दिया है।
क्या है पूरा विवाद?
ईडी ने आरोप लगाया है कि I-PAC के प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी के दौरान जांच में बाधा डाली गई। एजेंसी का दावा है कि छापे के समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं और वहां से एक लैपटॉप, मोबाइल फोन और कुछ अहम दस्तावेज हटाए गए। ईडी के अनुसार, यह कार्रवाई जांच को प्रभावित करने वाली थी और इसी कारण एजेंसी अब अदालत का रुख कर रही है।
किस मामले से जुड़ी है यह जांच?
यह पूरा मामला 2020 में सामने आए कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि ईस्टर्न कोलफील्ड्स के इलाकों से अवैध रूप से कोयला निकाला गया और उसे काले बाजार में बेचा गया। इस अवैध कमाई को हवाला नेटवर्क के जरिए अलग-अलग जगहों पर भेजा गया। ईडी का दावा है कि इसी नेटवर्क के माध्यम से I-PAC कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड को भी बड़ी मात्रा में फंड ट्रांसफर किया गया।
छापेमारी और बढ़ता विवाद
इसी जांच के तहत ईडी ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल और दिल्ली में करीब 10 ठिकानों पर छापेमारी की। शुरुआत में यह एक नियमित जांच जैसी लग रही थी, लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री के मौके पर पहुंचने की खबर सामने आई, मामला तूल पकड़ने लगा। ईडी का कहना है कि तलाशी की प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी थी, लेकिन राज्य प्रशासन के हस्तक्षेप से जांच में बाधा आई।
ममता बनर्जी का पक्ष
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह छापेमारी राजनीतिक मकसद से की गई है और केंद्र सरकार चुनाव से पहले दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। ममता बनर्जी ने साफ कहा कि उन्हें किसी भी जांच से डर नहीं है और सच्चाई अदालत के सामने आएगी। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी इसे “चुनावी एजेंडा” करार दिया है।
ईडी का स्पष्टीकरण
ईडी ने अपने बचाव में कहा है कि यह कार्रवाई किसी भी राजनीतिक दल को निशाना बनाकर नहीं की गई। एजेंसी का दावा है कि न तो किसी पार्टी कार्यालय पर छापा मारा गया और न ही चुनाव को ध्यान में रखकर कोई कदम उठाया गया। ईडी के मुताबिक, यह पूरी कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराध से जुड़े सबूतों के आधार पर की गई है और कानून के दायरे में रहकर की जा रही है।
पुलिस की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में कोलकाता पुलिस की भूमिका भी चर्चा में है। ईडी का आरोप है कि छापेमारी के दौरान पुलिस अधिकारियों ने एजेंसी के अधिकारियों की पहचान पत्रों की जांच की, जिससे कार्रवाई में देरी हुई। वहीं राज्य प्रशासन का कहना है कि पुलिस ने सिर्फ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाई।
हाईकोर्ट में होगी सुनवाई
ईडी अब इस मामले को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच चुकी है। शुक्रवार को होने वाली सुनवाई में यह तय हो सकता है कि क्या जांच में वाकई कोई बाधा डाली गई थी या नहीं। अदालत का फैसला इस मामले की दिशा तय करेगा।
राजनीति बनाम कानून
यह केस अब सिर्फ कानूनी नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। समर्थक इसे केंद्र की राजनीतिक दबाव की रणनीति बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का सवाल है—अगर छिपाने को कुछ नहीं था, तो जांच में दखल क्यों दिया गया?
आखिरकार, अदालत अपना फैसला देगी, लेकिन इस पूरे विवाद का असर बंगाल की राजनीति और आने वाले चुनावों पर साफ दिख सकता है। जनता के सामने अब सवाल यही है कि कानून और राजनीति के इस टकराव में सच किसके साथ है।
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