बीते नौ दिनों के भीतर एक जंगली नर हाथी के हमलों में 20 लोगों की जान जा चुकी है
Jharkhand elephant attack: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के चाईबासा और कोलहान वन प्रभाग इन दिनों भय और मातम के माहौल में डूबे हुए हैं। बीते नौ दिनों के भीतर एक जंगली नर हाथी के हमलों में 20 लोगों की जान जा चुकी है। लगातार हो रही मौतों से ग्रामीणों में गहरा डर बैठ गया है। हालात ऐसे हैं कि लोग रात में घरों से बाहर निकलने या खेतों में सोने से कतरा रहे हैं। समाचार लिखे जाने तक हाथी को पकड़ा नहीं जा सका था।
ज़िलाधिकारी चंदन कुमार ने इन सभी मौतों की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि शुक्रवार रात इलाज के दौरान एक घायल वनकर्मी की मौत के बाद मृतकों की संख्या 20 हो गई। वन विभाग ने पूरे प्रभावित क्षेत्र को हाई अलर्ट पर रखा है और ग्रामीणों को सतर्क रहने की अपील की जा रही है।
Jharkhand elephant attack पर वन विभाग की कार्रवाई
प्रभागीय वन अधिकारी कुलदीप मीणा के अनुसार, एक ही नर हाथी के कारण इस तरह की स्थिति पहली बार सामने आई है। उन्होंने कहा कि फिलहाल प्राथमिकता हाथी को ट्रेस कर सुरक्षित जंगल में वापस भेजने की है। इसके लिए पश्चिम बंगाल और ओडिशा से आई विशेष टीमों के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है।
वन विभाग ने करीब 10 विशेष टीमों में 100 से अधिक कर्मियों को तैनात किया है और ड्रोन की मदद से हाथी की गतिविधियों पर नज़र रखी जा रही है। साथ ही, मानकी-मुंडा (स्थानीय ढोल) के ज़रिए गांव-गांव लोगों को रात में बाहर न निकलने और खेतों में न सोने की चेतावनी दी जा रही है।
Jharkhand elephant attack से पीड़ित परिवारों की दर्दनाक कहानियां
1 से 9 जनवरी के बीच हाथी के हमले में मारे गए लोगों की कहानियां बेहद मार्मिक हैं। पहली मौत 34 वर्षीय मंगल सिंह हेम्ब्रम की हुई, जो टोंटो प्रखंड के बॉडीजारी गांव में घर लौटते समय हाथी के हमले का शिकार बने। इसके बाद खेतों और खलिहानों में फसल की रखवाली कर रहे कई ग्रामीणों की जान चली गई।
सबसे दिल दहला देने वाली घटना गोईलकेरा प्रखंड के सोवां गांव की है, जहां कुंदरा बहॉदा और उनके दो छोटे बच्चों—छह साल की कोदमा और आठ साल के सामु—की हाथी के हमले में मौत हो गई। उनकी पत्नी पुंडी टोपनो किसी तरह जान बचा सकीं, लेकिन आज वह घायल बेटी के इलाज के साथ-साथ पूरे परिवार के उजड़ने का दर्द झेल रही हैं।
नोवामुंडी प्रखंड के बाबाड़िया गांव में एक ही रात में पांच लोगों की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया। 50 वर्षीय सनातन मेरेल, उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चों की जान चली गई, जबकि दो बच्चे किसी तरह बच पाए। अब गांव के लोग सवाल उठा रहे हैं कि इन मासूमों की परवरिश और भविष्य की जिम्मेदारी कौन उठाएगा।
प्रशासन पर उठते सवाल और स्थानीय असंतोष
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता मानकी तुबिद वन विभाग की कार्रवाई से असंतुष्ट हैं। उनका कहना है कि अगर पहली मौत के बाद ही वन विभाग पूरी तरह सक्रिय हो जाता, तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान नहीं जाती। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें समय पर हाथी की गतिविधियों की जानकारी नहीं दी गई, जिससे वे सतर्क नहीं हो सके।
कई पीड़ित परिवार बेहद गरीब हैं और मिट्टी के घरों में रहते हैं। हाथी हमलों के बाद उनके सामने न केवल जान का संकट खड़ा हुआ, बल्कि रोज़ी-रोटी का सहारा भी छिन गया है।
आक्रामक हाथी के पीछे संभावित कारण
वन अधिकारियों का मानना है कि यह नर हाथी संभवतः मेटिंग स्टेज यानी ‘मस्ट’ की स्थिति में है। इस दौरान हार्मोनल बदलाव के कारण हाथी अत्यधिक आक्रामक हो जाता है। डीएफओ कुलदीप मीणा के अनुसार, यह अवस्था आमतौर पर 15 से 20 दिनों में सामान्य हो जाती है, लेकिन तब तक हाथी को सुरक्षित तरीके से जंगल में पहुंचाना बेहद ज़रूरी है।
अधिकारियों को यह भी संदेह है कि हाथी अपने झुंड से भटक गया है, जिससे वह लगातार मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, चाईबासा वन प्रमंडल पदाधिकारी आदित्य नारायण के अनुसार, हाथी की अंतिम लोकेशन ट्रेस करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है क्योंकि वह जवान और काफी फुर्तीला है।
मुआवज़ा, सहायता और बढ़ता मानव-हाथी संघर्ष
वन विभाग के नियमों के तहत हाथी हमले में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार को चार लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाता है, जबकि घायल व्यक्ति को अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक की सहायता मिल सकती है। ज़िलाधिकारी चंदन कुमार ने कहा है कि सभी मृतकों के परिवार बेहद गरीब हैं, इसलिए उन्हें आवास योजनाओं और अन्य सरकारी सहायता योजनाओं का भी तत्काल लाभ दिया जाएगा।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कोलहान और चाईबासा वन क्षेत्र में करीब 53 हाथी अलग-अलग झुंडों में मौजूद हैं। सरकारी डेटा बताता है कि झारखंड में 2019 से 2024 के बीच हाथी हमलों में 474 लोगों की मौत हो चुकी है।
रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डीएस श्रीवास्तव के मुताबिक, जंगलों की कटाई, हाथी गलियारों में सड़क, रेलवे लाइन और खनन जैसी गतिविधियों के कारण हाथियों के प्राकृतिक रास्ते बाधित हो रहे हैं। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष और बढ़ने की आशंका है।
पश्चिमी सिंहभूम की यह त्रासदी केवल एक हाथी की आक्रामकता की कहानी नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच बिगड़ते संतुलन की गंभीर चेतावनी भी है।





