Congress leaders on rape issue: सुंदर लड़की दिखी तो रेप?’ नेताओं की सोच पर उठे गंभीर सवाल
Congress leaders on rape issue: जनवरी 2026 की शुरुआत होते ही एक बार फिर देश की राजनीति में ऐसे बयान सुर्खियों में आ गए, जिन्होंने समाज को झकझोर कर रख दिया। मुद्दा है रेप जैसे गंभीर अपराध पर नेताओं की गैर-जिम्मेदार बयानबाज़ी। इस बार विवाद के केंद्र में हैं मध्य प्रदेश के भांडेर से कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया, समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन, और कर्नाटक के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के.आर. रमेश कुमार। तीनों के बयान अलग-अलग समय और संदर्भ में दिए गए, लेकिन सवाल एक ही है—क्या नेता अब भी महिलाओं के खिलाफ अपराध को हल्के में ले रहे हैं?
फूल सिंह बरैया की ‘रेप थ्योरी’ और बढ़ता आक्रोश
मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया जनवरी 2026 में उस वक्त विवादों में आ गए, जब उन्होंने एक इंटरव्यू में रेप की घटनाओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक तर्क दिया। उन्होंने कहा कि अगर कोई पुरुष सड़क पर जा रहा हो और उसे कोई “बहुत सुंदर लड़की” दिख जाए, तो उसका मन विचलित हो सकता है और रेप हो सकता है।
यहीं बात खत्म नहीं हुई। बरैया ने धार्मिक ग्रंथों और जातियों का जिक्र करते हुए दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लेकर भी अपमानजनक टिप्पणी कर दी। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल होते ही भारी विरोध शुरू हो गया। भाजपा ने इसे महिलाओं का अपमान और “विकृत मानसिकता” बताया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राहुल गांधी से बरैया को पार्टी से निकालने तक की मांग कर डाली।
विवाद बढ़ने पर फूल सिंह बरैया ने सफाई दी कि उन्होंने यह बातें अपनी नहीं कही थीं, बल्कि बिहार के एक प्रोफेसर हरि मोहन झा के कथन को सिर्फ संदर्भ के तौर पर उद्धृत किया था। कांग्रेस पार्टी ने भी खुद को उनके बयान से अलग करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया, लेकिन सवाल फिर भी बना रहा—क्या एक जनप्रतिनिधि को ऐसी बातें मंच से कहनी चाहिए?
एसटी हसन का बयान: वजह बताने की कोशिश या नया विवाद?
बरैया के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन भी विवादों में आ गए। उन्होंने रेप की घटनाओं के लिए शराब और इंटरनेट पर अश्लील कंटेंट को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि शराब पीने के बाद आदमी पत्नी और बेटी में फर्क भूल जाता है।
इतना ही नहीं, उन्होंने रेप के दोषियों के लिए सार्वजनिक चौराहे पर गोली मार देने जैसी सख्त सज़ा की बात भी कही। उनके इस बयान को भी अपराध की जड़ समझने के बजाय victim-blaming और oversimplification के तौर पर देखा गया। महिलाओं के खिलाफ अपराध को सिर्फ शराब या इंटरनेट से जोड़ देना, असल सामाजिक और कानूनी समस्याओं से ध्यान भटकाने जैसा माना गया।
पुराना बयान, नया गुस्सा: के.आर. रमेश कुमार का मामला
इसी बीच कर्नाटक के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कांग्रेस नेता के.आर. रमेश कुमार का एक पुराना वीडियो जनवरी 2026 में फिर से वायरल हो गया। दिसंबर 2021 में विधानसभा के अंदर उन्होंने कहा था,
“जब रेप अपरिहार्य हो, तो लेट जाओ और उसका आनंद लो।”
इस बयान ने उस वक्त भी देशभर में गुस्सा पैदा किया था और उन्हें सदन में माफी मांगनी पड़ी थी। अब वीडियो दोबारा सामने आने के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या माफी मांग लेने से ऐसे बयान खत्म हो जाते हैं, या सोच अब भी वही बनी रहती है?
राजनीति बनाम संवेदनशीलता
इन तमाम बयानों के बाद भाजपा ने कांग्रेस और सपा पर तीखा हमला बोला है। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि अगर राहुल गांधी और अखिलेश यादव ऐसे नेताओं पर कार्रवाई नहीं करते, तो यह साफ संकेत है कि उनकी पार्टियां ऐसे विचारों को बढ़ावा दे रही हैं। कुछ नेताओं ने तो कांग्रेस और सपा को “बलात्कारियों बचाओ पार्टी” तक कह दिया।
लेकिन असली सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से कहीं बड़ा है। रेप जैसे अपराध पर गैर-जिम्मेदार बयान सिर्फ महिलाओं का अपमान नहीं करते, बल्कि समाज में गलत संदेश भी फैलाते हैं। यह बयान पीड़िताओं के दर्द को कमतर आंकते हैं और अपराध की जिम्मेदारी अपराधी से हटाकर हालात, कपड़ों या इंटरनेट पर डाल देते हैं।
शब्द भी जिम्मेदारी होते हैं
नेताओं के पास मंच होता है, असर होता है और जिम्मेदारी भी। रेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बोलते वक्त शब्द सिर्फ शब्द नहीं रहते, वे सोच बनाते हैं। जब जनप्रतिनिधि ही असंवेदनशील होंगे, तो समाज से संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
आज जरूरत है बयानबाज़ी नहीं, बल्कि जवाबदेही, संवेदनशीलता और ठोस कार्रवाई की। क्योंकि महिलाओं की सुरक्षा कोई राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि इंसानियत का सवाल है।
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