Indian Rupee Record Low: डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट, रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव?
Indian Rupee Record Low: डॉलर के मुकाबले रुपया 91.65 पर पहुंचा। जानिए Foreign Capital Outflow, Global Geopolitical Tension और US Dollar Index ने रुपये को क्यों कमजोर किया।
Indian Rupee Record Low की खबर ने जनवरी 2026 की शुरुआत में बाजार और आम लोगों—दोनों की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.65 के स्तर पर बंद हुआ, जो अब तक का सर्वकालिक निचला स्तर माना जा रहा है। यह गिरावट अचानक नहीं आई, बल्कि कई घरेलू और वैश्विक कारणों के मेल से बनी परिस्थितियों का नतीजा है।
दिसंबर 2025 से अब तक रुपये में करीब 1.50% की कमजोरी दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं और सुरक्षित विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ा है।
रुपये की गिरावट का ताजा हाल
विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबार की शुरुआत 91.05 प्रति डॉलर के स्तर से हुई, लेकिन दिन के दौरान रुपया और कमजोर होकर 91.74 तक पहुंच गया। अंततः यह 91.65 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। इससे पहले भी रुपये ने लगातार नए निचले स्तर छुए थे, जिससे बाजार में दबाव बना हुआ है।
यह गिरावट केवल एक दिन की चाल नहीं, बल्कि बीते कुछ हफ्तों से जारी ट्रेंड का हिस्सा है।
Foreign Capital Outflow बना बड़ा कारण
Foreign Capital Outflow रुपये पर दबाव डालने वाला सबसे बड़ा फैक्टर माना जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से भारी मात्रा में पूंजी निकाली है। जब विदेशी निवेशक शेयर बेचते हैं, तो वे डॉलर की मांग बढ़ाते हैं, जिससे रुपये पर सीधा असर पड़ता है।
जनवरी 2026 के तीसरे सप्ताह में ही विदेशी निवेशकों ने हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिसने मुद्रा बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी।
Global Geopolitical Tension का असर
Global Geopolitical Tension भी रुपये की कमजोरी के पीछे एक अहम वजह है। हाल के दिनों में Greenland dispute, यूरोप-अमेरिका के बीच बढ़ते मतभेद और Venezuela oil reserves को लेकर बने तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा की है।
जब दुनिया में राजनीतिक या सैन्य तनाव बढ़ता है, तो निवेशक जोखिम से बचने के लिए डॉलर जैसी सुरक्षित मुद्रा की ओर रुख करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं कमजोर पड़ने लगती हैं।
US Dollar Index और Fed Policy का रोल
US Dollar Index फिलहाल ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है और ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख की संभावना बनी हुई है।
जब US Fed Policy सख्त होती है या ब्याज दरें ऊंची रहने की उम्मीद बनती है, तो निवेशक अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर आधारित एसेट्स को प्राथमिकता देते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और रुपये जैसी मुद्राएं दबाव में आ जाती हैं।
Domestic Market Weakness ने बढ़ाई चिंता
Domestic Market Weakness भी रुपये की कमजोरी को बढ़ावा दे रही है। शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिली है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में कमजोरी दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की धारणा और नकारात्मक हुई।
कमजोर शेयर बाजार का मतलब है कि विदेशी और घरेलू निवेशक दोनों सतर्क हो जाते हैं, और इसका असर सीधे मुद्रा बाजार पर पड़ता है।
Crude Oil Price का योगदान
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। Crude Oil Price में उतार-चढ़ाव रुपये के लिए हमेशा एक संवेदनशील मुद्दा रहता है।
हालांकि हालिया सत्र में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट देखी गई, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता के कारण तेल बाजार को लेकर चिंता बनी हुई है। अगर भविष्य में तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे, जिससे रुपये पर और दबाव आ सकता है।
Emerging Market Pressure की स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि Emerging Market Pressure सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस समय अस्थिर पूंजी प्रवाह और वैश्विक जोखिमों का सामना कर रही हैं।
ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित विकल्प चुनते हैं और डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इसका सीधा असर रुपये जैसी मुद्राओं पर पड़ता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले समय में रुपये की दिशा कई फैक्टर्स पर निर्भर करेगी:
- US Fed Policy में बदलाव
- India US Trade Deal को लेकर प्रगति
- Global Geopolitical Tension में कमी या बढ़ोतरी
- विदेशी निवेशकों का रुख
अगर वैश्विक हालात स्थिर होते हैं और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन अनिश्चितता बनी रहने पर दबाव जारी रह सकता है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
Indian Rupee Weakness का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है। कमजोर रुपया मतलब:
- आयात महंगा
- पेट्रोल-डीजल की लागत पर दबाव
- इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेशी शिक्षा महंगी
- महंगाई का खतरा
इसलिए रुपये की चाल केवल बाजार की खबर नहीं, बल्कि हर घर से जुड़ा आर्थिक मुद्दा है।







