Love Marriage Ban in MP: पंचायत का फरमान, इंटर कास्ट शादी करने वालों के पूरे परिवार का Social Boycott
Love Marriage Ban: मध्य प्रदेश के एक गांव से सामने आई यह खबर न सिर्फ चौंकाने वाली है, बल्कि आज के समाज और उसकी सोच पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां प्रेम विवाह और अंतरजातीय शादी को लेकर गांव की पंचायत ने ऐसा फैसला सुना दिया है, जिससे पूरे इलाके में डर, तनाव और असुरक्षा का माहौल बन गया है। पंचायत ने साफ कहा है कि अगर कोई युवक या युवती अपनी मर्जी से शादी करता है, खासकर जाति से बाहर, तो सिर्फ वही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से बहिष्कृत (Social Boycott) किया जाएगा।
प्यार करने से पहले गांव की “इजाज़त” जरूरी?
यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के पंचेवा गांव का बताया जा रहा है। यहां पंचायत की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि गांव की मर्जी के बिना शादी करना अब “गलती” मानी जाएगी। पंचायत के अनुसार, ऐसे परिवारों को गांव में किसी भी तरह का सहयोग नहीं मिलेगा। न कोई उनके घर दूध देगा, न राशन मिलेगा, न खेतों में मजदूरी दी जाएगी और न ही जमीन पट्टे पर दी जाएगी। यहां तक कि शादी, पूजा-पाठ या किसी सामाजिक कार्यक्रम में भी उन्हें बुलाया नहीं जाएगा।
यानी, एक फैसले से पूरे परिवार को समाज से काट देने की चेतावनी दी गई है।
तीन परिवारों को बनाया गया उदाहरण
इस फैसले की सबसे डराने वाली बात यह है कि पंचायत ने सिर्फ नियम नहीं बनाया, बल्कि तीन परिवारों के मुखियाओं के नाम सार्वजनिक तौर पर लेकर बहिष्कार का ऐलान कर दिया। पंचायत का तर्क है कि हाल के महीनों में कुछ युवतियों ने अपनी जाति से बाहर शादी की, जिससे गांव की “परंपराएं खतरे में” हैं। पंचायत का कहना है कि यह सख्ती दूसरों को ऐसा करने से रोकेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या परंपराओं के नाम पर किसी की जिंदगी और आज़ादी छीनी जा सकती है?
रिपब्लिक डे पर वीडियो वायरल, प्रशासन हरकत में
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब 26 जनवरी, रिपब्लिक डे के दिन पंचायत के फैसले का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो सामने आते ही जिला प्रशासन हरकत में आया। अधिकारियों ने तुरंत पंचायत को चेतावनी दी और कहा कि इस तरह का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार संविधान और कानून के खिलाफ है।
प्रशासन ने साफ शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार यह स्पष्ट कर चुका है कि बालिग लड़का-लड़की को अपनी मर्जी से शादी करने का पूरा अधिकार है, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि प्रभावित जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
कानून क्या कहता है?
कानूनी जानकारों के अनुसार पंचायत का यह फैसला पूरी तरह अवैध है।
भारत का संविधान हर नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता का अधिकार देता है। सामाजिक बहिष्कार न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन भी माना जाता है। ऐसे मामलों में पंचायत सदस्यों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
इसके बावजूद गांवों में आज भी ऐसे फरमान सामने आना यह दिखाता है कि कानून और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ी दूरी है।
डर के साए में जी रहे युवा
गांव के कई युवाओं का कहना है कि इस फैसले के बाद वे खुलकर बोलने से भी डरने लगे हैं। उनका कहना है कि वे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहते हैं, लेकिन पंचायत के दबाव और सामाजिक बहिष्कार के डर से चुप रहना मजबूरी बन गया है। कई युवाओं को डर है कि अगर उन्होंने प्रेम विवाह किया, तो उसका खामियाजा उनके माता-पिता और परिवार को भुगतना पड़ेगा।
समाज को अब खुद से सवाल पूछने होंगे
यह मामला सिर्फ एक गांव या एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है, जहां आज भी प्यार, बराबरी और व्यक्तिगत आज़ादी को अपराध की तरह देखा जाता है। सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी के भारत में भी प्यार करने के लिए “सजा” मिलेगी? क्या पंचायतें कानून से ऊपर हो गई हैं?
जब तक समाज इन सवालों से आंख नहीं मिलाएगा और युवाओं को अपने फैसले लेने का हक नहीं देगा, तब तक ऐसे फरमान डर बनकर लोगों की जिंदगी पर मंडराते रहेंगे।
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