एक युग का अंत! Parle-G Biscuit की जन्मभूमि अब होगी जमींदोज, 97 साल पुरानी फैक्ट्री टूटेगी
भारत के करोड़ों लोगों के बचपन की यादों से जुड़ा नाम है Parle-G Biscuit। चाय के साथ, स्कूल के टिफिन में या मुश्किल समय में सबसे सस्ता और भरोसेमंद नाश्ता—Parle-G हर घर का हिस्सा रहा है। लेकिन अब इस ब्रांड से जुड़ी एक ऐतिहासिक जगह हमेशा के लिए इतिहास बनने जा रही है।
मुंबई के विले पार्ले (ईस्ट) में स्थित वह फैक्ट्री, जहां Parle-G का जन्म हुआ था, अब 97 साल बाद गिराई जाएगी। यह खबर सिर्फ एक इमारत के टूटने की नहीं, बल्कि एक पूरे युग के अंत की तरह देखी जा रही है।
Parle-G Factory Demolition
इस फैक्ट्री की शुरुआत 1929 में हुई थी, जब भारत अंग्रेजों के शासन में था। चौहान परिवार ने विले पार्ले में Parle Products की नींव रखी। शुरुआती दिनों में यहां मिठाइयां और टॉफियां बनती थीं। बाद में यहीं से बिस्कुट बनाने का काम शुरू हुआ।
उस दौर में यह बिस्कुट ब्रिटिश बिस्कुट का भारतीय विकल्प था। सस्ता, टिकाऊ और आम लोगों की पहुंच में—यही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
Parle Gluco से Parle-G तक का सफर
शुरुआत में इस बिस्कुट को Parle Gluco Biscuit कहा जाता था। फिर 1980 के दशक में इसका नाम बदला गया और यह बना Parle-G।
यहां “G” का मतलब है Genius।
धीरे-धीरे यह बिस्कुट सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं रहा, बल्कि हर भारतीय घर की पहचान बन गया।
विले पार्ले की हवा में घुली रहती थी खुशबू
स्थानीय लोग बताते हैं कि एक समय था जब विले पार्ले स्टेशन से उतरते ही बिस्कुट की सौंधी खुशबू महसूस होती थी। सुबह-शाम फैक्ट्री के आसपास पूरा इलाका मीठी महक से भर जाता था।
यह फैक्ट्री सिर्फ उत्पादन केंद्र नहीं थी, बल्कि इलाके की भावनाओं और यादों का हिस्सा थी।
Parle Products Redevelopment Project
समय के साथ हालात बदले।
नई तकनीक, बड़े प्लांट और बढ़ती लागत के कारण मुंबई जैसी जगह पर उत्पादन करना मुश्किल हो गया।
2016 में इस फैक्ट्री से बिस्कुट बनना पूरी तरह बंद हो गया। इसके बाद यह परिसर धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गया, लेकिन लोगों की यादों में इसकी मौजूदगी बनी रही।
क्यों तोड़ी जा रही है फैक्ट्री?
अब Parle Products ने इस ज़मीन के पुनर्विकास (Redevelopment) का फैसला लिया है।
कंपनी यहां करीब ₹3,961 करोड़ की लागत से एक बड़ा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाएगी।
इसके लिए कंपनी को State Environment Impact Assessment Authority (SEIAA) से मंजूरी मिल चुकी है। यह अनुमति जनवरी 2026 में दी गई।
क्या बनेगा इस जगह पर?
योजना के मुताबिक:
- करीब 5.44 हेक्टेयर जमीन पर निर्माण
- चार कमर्शियल बिल्डिंग
- दो अलग पार्किंग टावर
- रिटेल शॉप्स, फूड कोर्ट, रेस्टोरेंट
- कुल निर्माण क्षेत्र: लगभग 1.9 लाख वर्ग मीटर
एयरपोर्ट के पास होने के कारण बिल्डिंग की ऊंचाई पर भी सीमाएं तय की गई हैं।
पर्यावरण को लेकर क्या होगा?
परियोजना क्षेत्र में कुल 508 पेड़ दर्ज हैं।
- 311 पेड़ सुरक्षित रखे जाएंगे
- 129 पेड़ हटाए जाएंगे
- 68 पेड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाएगा
कंपनी ने मियावाकी पद्धति से नए पेड़ लगाने का भी वादा किया है, हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ता इसे लेकर सतर्क रहने की बात कह रहे हैं।
भावनाएं बनाम विकास
स्थानीय लोगों की भावनाएं बंटी हुई हैं।
कुछ के लिए यह बचपन की यादों का अंत है, तो कुछ इसे रोजगार और विकास का अवसर मान रहे हैं।
एक बुजुर्ग स्थानीय निवासी कहते हैं,
“फैक्ट्री टूटेगी, लेकिन उसकी खुशबू हमारी यादों में हमेशा रहेगी।”
बदलती मुंबई की तस्वीर
Parle-G फैक्ट्री का गिरना उस बदलाव का प्रतीक है, जिसमें मुंबई अपनी औद्योगिक पहचान से निकलकर कॉर्पोरेट और रियल एस्टेट हब बनती जा रही है।
यह कहानी सिर्फ Parle-G की नहीं, बल्कि उस शहर की है जो समय के साथ आगे बढ़ रहा है—कुछ यादों को पीछे छोड़ते हुए।
जहां कभी बिस्कुट की खुशबू थी, वहां अब कांच और कंक्रीट के टावर होंगे।
लेकिन Parle-G का स्वाद और उसकी कहानी हमेशा भारत के दिल में जिंदा रहेगी।
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