Delhi Missing Persons Statistics: अफवाह या हकीकत? दिल्ली में बच्चों-लड़कियों के गायब होने की पड़ताल
Delhi Missing Persons Statistics: देश की राजधानी दिल्ली… जहां संसद है, सुप्रीम कोर्ट है, हाई सिक्योरिटी ज़ोन हैं। लेकिन इसी दिल्ली में हर दिन सैकड़ों लोग ऐसे गायब हो रहे हैं, जिनका कोई सुराग नहीं मिल पा रहा। यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के अपने आधिकारिक आंकड़ों की सच्चाई है।
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 के पहले सिर्फ 15 दिनों में 807 लोग लापता दर्ज किए गए। यानी औसतन हर दिन 50 से ज्यादा लोग। इनमें महिलाएं, लड़कियां, बच्चे, बुजुर्ग—सब शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से आधे से ज्यादा लोग आज भी अनट्रेस्ड हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब आंकड़े इतने गंभीर हैं, तो फिर दिल्ली पुलिस के बड़े अधिकारी कैसे कह देते हैं कि “घबराने की कोई बात नहीं है”?
हर साल वही कहानी, हर बार वही जवाब
Missing Children in Delhi 2026 कोई नई समस्या नहीं है। दिल्ली में पिछले कई सालों से बच्चों के लापता होने का सिलसिला लगातार जारी है। जिपनेट (ZIPNET) जैसे पुलिस डेटाबेस के आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 2026 के बीच दिल्ली में 60 हजार से ज्यादा बच्चे लापता दर्ज किए गए। इनमें से करीब 7 हजार बच्चों का आज तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है।
इसका मतलब यह है कि हर साल सैकड़ों बच्चे ऐसे हैं, जिनकी फाइलें तो बंद हो जाती हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी का जवाब न परिवार को मिलता है, न सिस्टम के पास होता है।
महिलाएं और किशोरियां सबसे ज्यादा असुरक्षित
आंकड़े साफ़ बताते हैं कि लापता होने वालों में महिलाओं और लड़कियों का अनुपात सबसे ज्यादा है।
2026 के शुरुआती 15 दिनों में:
- कुल 807 लापता
- 63% महिलाएं और लड़कियां
- 191 मामले नाबालिगों के
- 143 बच्चे अब तक नहीं मिले
खासतौर पर 12 से 18 साल की किशोरियां सबसे ज्यादा लापता हो रही हैं। यह सिर्फ “घर से नाराज़ होकर चले जाने” की कहानी नहीं हो सकती। हर केस में वही बहाना देना, अब सवाल खड़े करता है।
अफवाह या हकीकत?
Delhi Kidnapping Rumours vs Facts को लेकर हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई डर फैलाने वाले वीडियो और ऑडियो वायरल हुए हैं, जिनमें किडनैपिंग गैंग और ह्यूमन ट्रैफिकिंग की बातें की जा रही हैं। Delhi Police का कहना है कि ये सब अफवाहें हैं और लोगों में डर फैलाने की साजिश का हिस्सा हैं।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता—
अगर सब कुछ सिर्फ अफवाह है, तो हर साल आधिकारिक आंकड़े क्यों और ज्यादा डरावने होते जा रहे हैं?
और अगर हालात सामान्य हैं, तो हर साल 11 प्रतिशत बच्चे हमेशा के लिए क्यों गायब हो जाते हैं?
शिकायत दर्ज न करने के निर्देश?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई मामलों में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज ही नहीं की जाती। परिवारों का कहना है कि पुलिस पहले “24 घंटे इंतजार”, “भागकर गया होगा”, “खुद लौट आएगा” जैसे बहाने देती है।
अगर यह आरोप सही हैं, तो सवाल और बड़ा हो जाता है—
जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, अगर वे पूरी सच्चाई भी नहीं हैं, तो असल स्थिति कितनी भयावह होगी?
एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट सिर्फ कागजों में?
दिल्ली पुलिस दावा करती है कि हर जिले में एंटी मिसिंग सेल और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट काम कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि जिन बच्चों या महिलाओं का सालों तक कोई पता नहीं चलता, उनके केस धीरे-धीरे फाइलों में दब जाते हैं।
परिवार दर-दर भटकते हैं—थाने, कोर्ट, अफसर—लेकिन जवाब नहीं मिलता।
सिर्फ आंकड़े नहीं, इंसानी ज़िंदगियां हैं
हर लापता आंकड़े के पीछे एक चेहरा है, एक परिवार है, एक मां-बाप हैं जो हर दिन दरवाज़े की आहट सुनकर उम्मीद करते हैं।
यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनशीलता का सवाल है।
असली सवाल जो जवाब मांगते हैं
- जो बच्चे कभी नहीं मिले, उनके साथ क्या हुआ?
- क्या सभी मामले “घर से भागने” के थे?
- अगर नहीं, तो अपराधी कहां हैं?
- और सबसे अहम—जवाबदेही किसकी है?
डर नहीं, जागरूकता ज़रूरी है
दिल्ली को डर के शहर में बदलने की जरूरत नहीं, लेकिन सच से आंख चुराने की भी इजाज़त नहीं दी जा सकती।
अफवाहें रोकना जरूरी है, लेकिन आंकड़ों से भागना और सवालों को दबाना सबसे खतरनाक है।
जब तक लापता लोगों की संख्या सिर्फ नंबर बनी रहेगी और जवाब तय नहीं होंगे, तब तक दिल्ली के ‘लापता शहर’ बनने की यह कहानी यूं ही चलती रहेगी।
और हर गुजरते दिन के साथ, कोई और परिवार इस इंतज़ार में जुड़ता जाएगा—
“वो लौटेगा… या कभी नहीं?”
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