Surya Grahan 2026: 37 साल बाद बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए 5 बड़ी बातें और कहां दिखेगा ‘Ring of Fire’
Surya Grahan 2026: 37 Years Rare Eclipse के रूप में 17 फरवरी 2026 को आसमान में एक खास खगोलीय घटना देखने को मिलेगी—सूर्य ग्रहण। इस बार का ग्रहण कई वजहों से चर्चा में है। एक ओर ज्योतिष के अनुसार इसे कुंभ राशि में बन रहे दुर्लभ ग्रह योग के कारण विशेष माना जा रहा है, तो दूसरी ओर खगोल विज्ञान की दृष्टि से यह एक एनुलर सोलर एक्लिप्स, यानी ‘रिंग ऑफ फायर’, होगा।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह सूर्य ग्रहण क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे जुड़ी पांच बड़ी बातें क्या हैं।
कुंभ राशि में बनेगा खास ग्रह संयोग
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 17 फरवरी को लगने वाला सूर्य ग्रहण कुंभ राशि में धनिष्ठा नक्षत्र के चौथे चरण में लगेगा। बताया जा रहा है कि इस दौरान सूर्य के साथ राहु, बुध, शुक्र और चंद्रमा भी कुंभ राशि में मौजूद रहेंगे।
एक ही राशि में इतने ग्रहों का एक साथ आना बेहद दुर्लभ माना जाता है। कहा जा रहा है कि ऐसा संयोग करीब 37 साल पहले 1989 में बना था। ज्योतिष मान्यता के अनुसार, जब सूर्य और राहु एक साथ बैठते हैं तो ग्रहण योग बनता है, जिसे शुभ नहीं माना जाता।
कब लगेगा और कितनी देर रहेगा ग्रहण?
Surya Grahan Time in India के अनुसार यह सूर्य ग्रहण दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगा और शाम 7 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगा। इसकी कुल अवधि लगभग 4 घंटे 32 मिनट की रहेगी।
सूतक काल ग्रहण से करीब 12 घंटे पहले, यानी रात 3 बजकर 26 मिनट से शुरू माना जाएगा। हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए धार्मिक मान्यता के अनुसार सूतक का प्रभाव भारत में मान्य नहीं होगा।
‘Ring of Fire’ क्या होता है?
यह ग्रहण सामान्य पूर्ण सूर्य ग्रहण नहीं बल्कि एनुलर सोलर एक्लिप्स होगा। इसका मतलब है कि जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आएगा, तब वह सूर्य को पूरी तरह नहीं ढक पाएगा।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उस समय चंद्रमा पृथ्वी से थोड़ी अधिक दूरी पर होता है। नतीजा यह होता है कि सूर्य के चारों ओर आग की अंगूठी जैसा चमकदार घेरा बन जाता है। यही कारण है कि इसे ‘रिंग ऑफ फायर’ कहा जाता है।
यह दृश्य बेहद खूबसूरत होता है, लेकिन इसे बिना सुरक्षा चश्मे के देखना आंखों के लिए खतरनाक हो सकता है।
भारत में दिखेगा या नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भारत में यह सूर्य ग्रहण दिखाई देगा? जवाब है—नहीं।
यह एनुलर फेज मुख्य रूप से अंटार्कटिका के दूर-दराज इलाकों में दिखाई देगा। वहां रिसर्च स्टेशनों जैसे कॉनकोर्डिया और मिरनी के आसपास ‘रिंग ऑफ फायर’ का नजारा दिखेगा।
दक्षिणी अफ्रीका के कुछ देशों—जैसे दक्षिण अफ्रीका, जाम्बिया, जिम्बाब्वे और तंजानिया—में आंशिक ग्रहण देखा जा सकेगा। दक्षिण अमेरिका के अर्जेंटीना और चिली के दक्षिणी हिस्सों में भी यह आंशिक रूप में दिखेगा।
भारत समेत उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश हिस्सों में यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा।
साल 2026 में और भी ग्रहण
साल 2026 में यह पहला सूर्य ग्रहण होगा। इसके बाद 12 अगस्त 2026 को दूसरा सूर्य ग्रहण लगेगा, जो पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा। हालांकि वह भी भारत में दिखाई नहीं देगा।
इसके अलावा 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्र ग्रहण भी लगेगा।
विज्ञान बनाम ज्योतिष—क्या मानें?
जहां ज्योतिष इसे दुर्लभ ग्रह संयोग और संभावित प्रभावों से जोड़कर देखता है, वहीं विज्ञान इसे पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की एक स्वाभाविक खगोलीय प्रक्रिया मानता है।
NASA और अन्य खगोल एजेंसियों के अनुसार यह एक सामान्य खगोलीय घटना है, जो समय-समय पर होती रहती है। हालांकि ‘रिंग ऑफ फायर’ जैसा दृश्य हर बार नहीं बनता, इसलिए इसे खास माना जाता है।
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