तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हिंद महासागर के किनारे बसे 48 मछुआरा गांव आज प्लास्टिक मुक्त बन चुके हैं।
Kanyakumari plastic free villages: तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हिंद महासागर के किनारे बसे 48 मछुआरा गांव आज प्लास्टिक मुक्त बन चुके हैं। यह बदलाव किसी सरकारी योजना या एनजीओ की मदद से नहीं, बल्कि गांव के बच्चों और युवाओं के प्रयास से संभव हुआ है। करीब 15 किलोमीटर लंबे तटीय क्षेत्र को साफ कर यहां छह सुंदर बीच तैयार किए गए हैं। अब यहां रोज 250 से 300 पर्यटक पहुंच रहे हैं।
सात साल से जारी है अभियान
इस मुहिम की शुरुआत 2019 में इंजीनियर मेलबिन रॉबिन ने की थी। 2017 के ओखी चक्रवात में उन्होंने अपने दो भाइयों को खो दिया था। चक्रवात के बाद तट पर फैले प्लास्टिक ने तबाही को और बढ़ा दिया था। इसी अनुभव ने उन्हें सफाई अभियान शुरू करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत दो दोस्तों से हुई, जो अब सैकड़ों युवाओं का आंदोलन बन चुका है।
850 बच्चे और 500 युवा जुड़े
‘नेगिजी इल्ला नेथल पडई’ नाम की टीम इस अभियान को चला रही है। इसमें 850 स्कूली बच्चे और 500 ग्रेजुएट युवा शामिल हैं। सभी सदस्य इन्हीं गांवों के रहने वाले हैं। हर वीकेंड ये समूह बनाकर समुद्र तट और गांवों की सफाई करते हैं। अब तक 7,400 किलो से ज्यादा प्लास्टिक कचरा हटाया जा चुका है।
कचरे से ही चलता है खर्च
यह टीम किसी से फंडिंग नहीं लेती। इकट्ठा किए गए प्लास्टिक को रीसाइक्लिंग के लिए बेच दिया जाता है। उसी पैसे से दस्ताने, जूते और अन्य सफाई उपकरण खरीदे जाते हैं। यह आत्मनिर्भर मॉडल लोगों को काफी प्रभावित कर रहा है।
मछुआरों की सोच में बदलाव
पहले मछुआरे समुद्र में इस्तेमाल हुआ प्लास्टिक वहीं छोड़ देते थे। अब वे उसे वापस किनारे लेकर आते हैं। गांवों में गीले और सूखे कचरे के लिए अलग डस्टबिन रखे जाते हैं। इससे कचरा प्रबंधन आसान हुआ है और तट पहले से ज्यादा साफ दिखने लगा है।
‘कचरा लाओ, साइकिल पाओ’ योजना
लोगों को जोड़ने के लिए ब्रिगेड ने अनोखी योजना शुरू की। जो परिवार सबसे ज्यादा प्लास्टिक इकट्ठा करता है, उसे साइकिल या जरूरी सामान इनाम में दिया जाता है। पिछले साल तीन गांवों से पांच लाख से ज्यादा दूध के प्लास्टिक पैकेट रीसाइक्लिंग के लिए भेजे गए।
प्रशासन भी हुआ प्रभावित
जिला वन अधिकारी इल्लैयाराजा ने माना कि यह समूह तटीय क्षेत्र के 80 प्रतिशत हिस्से को साफ कर चुका है। विभाग भी अभी तक उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया। एरायुमंथुरई गांव के छात्र मैक्सवेल बताते हैं कि वे चौथी कक्षा से इस अभियान से जुड़े हैं।
बना प्रेरणा का मॉडल
कन्याकुमारी के इन गांवों ने दिखा दिया कि अगर समाज ठान ले, तो बड़ा बदलाव संभव है। बच्चों की यह पहल अब दूसरे तटीय इलाकों के लिए प्रेरणा बन रही है।
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