देश की शीर्ष अदालत Supreme Court of India ने गंभीर आपराधिक मामलों में सजा कम कर मुआवजा बढ़ाने की प्रवृत्ति को “खतरनाक ट्रेंड” करार दिया है।
SC Strikes Down Madurai High Court Verdict: देश की शीर्ष अदालत Supreme Court of India ने गंभीर आपराधिक मामलों में सजा कम कर मुआवजा बढ़ाने की प्रवृत्ति को “खतरनाक ट्रेंड” करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने से समाज में गलत संदेश जाता है कि आरोपी केवल आर्थिक भुगतान कर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सजा का मूल उद्देश्य अपराध के प्रति भय उत्पन्न करना और भविष्य में अपराधों को रोकना है। यदि सजा अत्यधिक नरम कर दी जाए, तो उसका प्रतिरोधात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है।
किस मामले में हुई सुनवाई?
यह टिप्पणी मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। Madras High Court की मदुरै बेंच ने चाकू से हमला कर गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दो आरोपियों की तीन साल की सजा घटाकर जुर्माने की राशि बढ़ा दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों दोषियों को तीन-तीन वर्ष की सजा सुनाई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने सजा कम करते हुए प्रत्येक आरोपी पर 5,000 रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट की मूल सजा बहाल कर दी।
“मुआवजा सजा का विकल्प नहीं”
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पीड़ित को मुआवजा देना न्याय प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसे कारावास या अन्य दंड के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने दोहराया कि भारतीय न्याय व्यवस्था प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और संतुलन के सिद्धांतों पर आधारित है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि गंभीर अपराधों में सजा घटाकर केवल आर्थिक दंड पर जोर दिया जाए, तो इससे अपराधियों में दंड का भय कम हो सकता है। इससे समाज में यह धारणा बन सकती है कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति कठोर सजा से बच सकते हैं।
BNSS की धारा 395 पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 395 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि इसमें पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान है, लेकिन यह दंड के अतिरिक्त है, न कि उसका स्थानापन्न। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करना है, साथ ही अपराध के प्रति समाज में स्पष्ट संदेश देना भी है।
सजा तय करते समय किन बातों पर विचार?
शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों को दिशा-निर्देश देते हुए कहा कि सजा निर्धारित करते समय निम्नलिखित पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए:
अपराध और सजा के बीच संतुलन (प्रोपोर्शनैलिटी)
मामले के तथ्य और परिस्थितियां
अपराध का सामाजिक प्रभाव
गंभीर (एग्रीवेटिंग) और राहतकारी (मिटिगेटिंग) कारक
आरोपी का आचरण और आपराधिक पृष्ठभूमि
पीठ ने कहा कि न्यायालयों का दायित्व है कि वे ऐसी सजा दें जो न तो अत्यधिक कठोर हो और न ही इतनी नरम कि उसका निवारक प्रभाव खत्म हो जाए।
आरोपियों को चार सप्ताह में सरेंडर का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट की तीन वर्ष की सजा को बहाल कर दिया। साथ ही दोनों दोषियों को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने और शेष सजा काटने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले से जेल में बिताई गई अवधि का समायोजन किया जाएगा।
न्याय व्यवस्था के लिए व्यापक संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। हाल के वर्षों में कई मामलों में अदालतों द्वारा सजा कम कर मुआवजा बढ़ाने के निर्णय सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का संकेत देती है।
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि न्याय केवल आर्थिक प्रतिपूर्ति तक सीमित नहीं हो सकता। अपराध की गंभीरता के अनुरूप दंड देना समाज में कानून के प्रति सम्मान और विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को आपराधिक न्याय प्रणाली में संतुलन और जवाबदेही की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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