देश में चुनावी मौसम के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा घोषित की जाने वाली ‘मुफ्त योजनाओं’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है।
Supreme Court on freebies: देश में चुनावी मौसम के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा घोषित की जाने वाली ‘मुफ्त योजनाओं’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए संसाधनों का अंधाधुंध वितरण राज्यों की वित्तीय सेहत को कमजोर कर सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सरकारों को ऐसी योजनाओं की बजाय दीर्घकालिक और टिकाऊ नीतियों पर जोर देना चाहिए, जो लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार ला सकें।
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि राज्य सरकारों का कर्तव्य है कि वे जरूरतमंदों को सहायता उपलब्ध कराएं, लेकिन राजकोषीय अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने टिप्पणी की, “राज्य घाटे में चल रहे हैं, फिर भी मुफ्त योजनाएं जारी हैं। यह सोचना होगा कि जो राजस्व एकत्र होता है, उसका एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में क्यों नहीं लगाया जा सकता?”
Supreme Court on freebies पर क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणाओं में मुफ्त वितरण के बजाय रोजगार सृजन, कौशल विकास और बेरोजगारी भत्ता जैसी संरचित योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि केवल वस्तुओं या नकद राशि का वितरण सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को स्थायी रूप से कम नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि यदि कोई राज्य बेरोजगारी या गरीबी उन्मूलन के लिए खर्च करता है, तो उसे बजट में स्पष्ट रूप से दर्शाना चाहिए कि यह व्यय किस उद्देश्य के लिए है। उन्होंने पूछा, “जब यह नियोजित व्यय है, तो बजट प्रस्ताव में पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई जाती?”
सभी राज्यों पर लागू टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी किसी एक राज्य के संदर्भ में नहीं है। अदालत का कहना था कि देश के लगभग सभी राज्यों में चुनावों के दौरान मुफ्त बिजली, पानी, परिवहन, लैपटॉप, नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं घोषित की जाती हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, कई राज्यों का राजकोषीय घाटा पहले से ही बढ़ा हुआ है। यदि राजस्व का बड़ा हिस्सा सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं में खर्च होता है, तो बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश प्रभावित हो सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि सरकारों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी योजनाओं का दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव क्या होगा और क्या वे वित्तीय रूप से टिकाऊ हैं।
आर्थिक विकास बनाम राजनीतिक लाभ
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि “फिजूलखर्ची” से आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि कल्याणकारी योजनाएं संविधान के अनुरूप हैं और राज्य का दायित्व है कि वह कमजोर वर्गों की सहायता करे।
विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या तब उत्पन्न होती है जब योजनाएं बिना वित्तीय संसाधनों के आकलन के घोषित की जाती हैं। इससे कर्ज का बोझ बढ़ता है और आने वाली पीढ़ियों पर दबाव पड़ता है।
नीति आयोग और रिजर्व बैंक की रिपोर्टों में भी समय-समय पर राज्यों के बढ़ते ऋण और सब्सिडी भार को लेकर चेतावनी दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक आर्थिक बहस का हिस्सा मानी जा रही है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
अदालत ने सुझाव दिया कि यदि राज्य सरकारें सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यय करती हैं, तो उन्हें इसे स्पष्ट रूप से “नियोजित व्यय” के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए और यह बताना चाहिए कि इससे कितने लोगों को लाभ होगा और कितने समय तक।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि योजनाएं कौशल विकास, रोजगार सृजन और उद्यमिता को बढ़ावा देने से जुड़ी हों, तो उनका सकारात्मक प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है। वहीं, केवल उपभोग आधारित मुफ्त योजनाएं अल्पकालिक राहत तो देती हैं, लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा नहीं देतीं।
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