Gujarat High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी के बिना बताए मायके में रात बिताने पर पति द्वारा एक बार थप्पड़ मारने की घटना को स्वतः “क्रूरता” नहीं माना जा सकता।
Gujarat High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी के बिना बताए मायके में रात बिताने पर पति द्वारा एक बार थप्पड़ मारने की घटना को स्वतः “क्रूरता” नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत क्रूरता साबित करने के लिए लगातार, गंभीर और असहनीय उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
यह फैसला लगभग तीन दशक पुराने एक मामले में आया, जिसमें पति को निचली अदालत ने आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता के आरोप में दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की कमी का हवाला देते हुए उस सजा को रद्द कर दिया।
क्या कहा Gujarat High Court ने?
Gujarat High Court न्यायमूर्ति Gita Gopi ने अपने आदेश में कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) के मामलों में यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी के कृत्य और आत्महत्या के बीच “निकट और प्रत्यक्ष कारण संबंध” (proximate cause) हो। केवल सामान्य वैवाहिक विवाद या एकल घटना को आधार बनाकर कठोर दंड नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी एक अलग-थलग घटना, जैसे कि गुस्से में थप्पड़ मार देना, को तब तक ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जब तक यह साबित न हो कि वह व्यवहार लगातार और असहनीय था तथा उसने पीड़िता को आत्महत्या के लिए मजबूर किया।
मामला क्या था?
यह मामला दिलीपभाई मंगलाभाई वरली द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। सेशंस कोर्ट ने वर्ष 2003 में उन्हें दोषी करार देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत सात वर्ष और धारा 498ए (क्रूरता) के तहत एक वर्ष की सजा सुनाई थी।
घटना मई 1996 की बताई गई थी, जब उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पति द्वारा उत्पीड़न और मारपीट के कारण महिला ने यह कदम उठाया।
बचाव पक्ष और राज्य की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता धवल व्यास ने अदालत में तर्क दिया कि आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। उन्होंने कहा कि दहेज मांग या लगातार उत्पीड़न का कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।
बचाव पक्ष के अनुसार, पति-पत्नी के बीच विवाद मुख्य रूप से घरेलू बातों को लेकर होता था। आरोप था कि पत्नी बिना बताए मायके में रुक गई थीं, जिससे विवाद हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि पति का रात में बैंजो बजाने के कार्यक्रमों में जाना और देर से लौटना दोनों के बीच मतभेद का कारण बनता था।
वहीं राज्य की ओर से सरकारी वकील ज्योति भट्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही बताते हुए सजा बरकरार रखने की मांग की।
क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष लगातार क्रूरता, गंभीर शारीरिक हिंसा या दहेज उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका। न तो मेडिकल रिकॉर्ड में गंभीर चोटों का प्रमाण था और न ही पूर्व में दर्ज कोई औपचारिक शिकायत सामने आई।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों के बिना ही आरोपी को दोषी ठहरा दिया था। ऐसे में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
कानूनी दृष्टि से क्यों अहम है फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय धारा 498ए और 306 के मामलों में साक्ष्य की गुणवत्ता और निरंतरता के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने संकेत दिया कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य विवादों और गंभीर आपराधिक क्रूरता के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है।
यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बन सकता है, जहां आत्महत्या के मामलों में प्रत्यक्ष कारण संबंध स्थापित करना चुनौतीपूर्ण होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य पीड़ितों की रक्षा करना है, लेकिन बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
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