Gen Z Anxiety Disorder और Anger से क्यों परेशान है ? क्या डिजिटल लाइफ बना रही है युवाओं को बेचैन?
Gen Z Anxiety Disorder: आज की Gen Z बाहर से बेहद आत्मविश्वासी, टेक-सेवी और खुलकर अपनी बात रखने वाली दिखती है। लेकिन अंदर ही अंदर यही पीढ़ी सबसे ज्यादा मानसिक दबाव झेल रही है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, ओवरथिंकिंग करना, हर समय बेचैनी महसूस होना और भविष्य को लेकर चिंता—ये सब अब आम होते जा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
1. डिजिटल लाइफस्टाइल का दबाव
Screen Time and Mental Health के संदर्भ में देखा जाए तो Gen Z की जिंदगी का बड़ा हिस्सा अब स्क्रीन पर ही बीतता है। सुबह उठते ही फोन और रात सोने से पहले भी फोन। सोशल मीडिया पर दूसरों की “परफेक्ट” लाइफ देखकर खुद की तुलना करना एक गंभीर समस्या बन चुका है।
हर पोस्ट, हर स्टोरी और हर लाइक जैसे आत्मसम्मान से जुड़ गया है। पोस्ट पर कम लाइक आएं तो मूड खराब, और किसी और को ज्यादा मिल जाएं तो मन में असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन दिमाग को आराम नहीं लेने देते, जिससे चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान बढ़ती चली जाती है।
2. करियर की दौड़ और अनिश्चित भविष्य
Career Pressure on Gen Z आज की युवा पीढ़ी के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुका है। कम उम्र में ही “कुछ बड़ा करने” का दबाव लगातार महसूस किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर 22–23 साल के करोड़पति, स्टार्टअप फाउंडर या इंफ्लुएंसर को देखकर कई युवाओं को लगता है कि अगर वे अभी सफल नहीं हुए, तो वे पीछे रह जाएंगे।
इसके साथ ही नौकरी की अस्थिरता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आर्थिक दबाव एंग्जायटी को और बढ़ा देते हैं। कई बार डिग्री होने के बावजूद नौकरी की गारंटी नहीं मिलती, जिससे आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
3. सामाजिक अलगाव
Social Media Pressure की विडंबना यह है कि Gen Z सबसे ज्यादा “कनेक्टेड” पीढ़ी होने के बावजूद भावनात्मक रूप से अक्सर अकेली महसूस करती है। ऑनलाइन चैट और वीडियो कॉल असली, आमने-सामने की बातचीत की जगह नहीं ले सकते।
दोस्तों और परिवार के साथ सीधी बातचीत कम होती जा रही है। जब भावनाएं खुलकर साझा नहीं हो पातीं, तो अंदर जमा तनाव धीरे-धीरे एंग्जायटी का रूप लेने लगता है।
4. नींद और दिनचर्या की गड़बड़ी
Mental Wellness Tips for Youth के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि देर रात तक मोबाइल चलाना, सीरीज देखना या ‘डूमस्क्रॉलिंग’ करना अब आम आदत बन चुकी है। डूमस्क्रॉलिंग का मतलब है लगातार नकारात्मक खबरें और वीडियो देखते रहना, जिससे दिमाग हर समय तनाव की स्थिति में रहता है।
नींद की कमी का सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कम नींद से ध्यान भटकने लगता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।
5. पढ़ने और गहरी सोच की कमी
Gen Z Emotional Health को लेकर कुछ रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि नई पीढ़ी में ध्यान केंद्रित करने और गहराई से सोचने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। लंबे लेख पढ़ने या किसी विषय पर गंभीर चर्चा में रुचि पहले की तुलना में कम हो रही है।
डिजिटल कंटेंट की लगातार खपत ने दिमाग को तेज़ तो बना दिया है, लेकिन कहीं न कहीं सतही भी। छोटी-छोटी क्लिप्स और रील्स देखने की आदत के कारण लंबे समय तक एक ही चीज पर फोकस बनाए रखना मुश्किल लगने लगा है।
क्या सच में Gen Z कम समझदार है?
यह कहना सही नहीं होगा कि Gen Z कम बुद्धिमान है। उनकी इंटेलिजेंस अलग तरह की है। वे टेक्नोलॉजी में माहिर हैं, नए विचारों के लिए खुले हैं और सामाजिक मुद्दों पर जागरूक भी हैं।
समस्या यह है कि लगातार डिजिटल दबाव और तेज़ रफ्तार जीवनशैली ने मानसिक संतुलन को चुनौती दी है।
समाधान क्या है?
- डिजिटल डिटॉक्स: दिन में कुछ घंटे बिना फोन के बिताएं।
- नियमित व्यायाम: हल्की वॉक या योग भी मानसिक तनाव कम करता है।
- पर्याप्त नींद: कम से कम 6-7 घंटे की नींद जरूरी है।
- खुलकर बात करें: दोस्तों, परिवार या काउंसलर से अपनी भावनाएं साझा करें।
- पढ़ने की आदत: रोज थोड़ा समय किताब या लंबा लेख पढ़ने में लगाएं।
अंत में
Gen Z कमजोर नहीं है, लेकिन उस पर दबाव बहुत ज्यादा है। डिजिटल दुनिया, करियर की होड़ और सामाजिक बदलावों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।
अगर सही समय पर जागरूकता और समर्थन मिले, तो यही पीढ़ी सबसे मजबूत बनकर उभर सकती है। मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है।
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