131st Amendment फेल, Kiren Rijiju का पलटवार: “ये महिलाओं के साथ अन्याय”
131st Amendment: लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो पाया, लेकिन इसके बाद जो राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई, उसने इस मुद्दे को और बड़ा बना दिया है। यह सिर्फ एक विधेयक का गिरना नहीं रहा, बल्कि अब यह महिलाओं के अधिकार, राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप की नई बहस में बदल चुका है।
सरकार का आरोप: महिलाओं के साथ अन्याय
केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने बिल के गिरने के बाद विपक्ष पर सीधा हमला बोला। उनका कहना है कि इस बिल को रोककर विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कांग्रेस पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि सोच को दिखाता है।
रिजिजू का यह भी कहना था कि सरकार को इस बात का दुख नहीं है कि बिल पास नहीं हो पाया, बल्कि इस बात का है कि इससे महिलाओं को नुकसान हुआ। उन्होंने यह तक कहा कि विपक्ष को आने वाले समय में महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा और यह आरोप उनके साथ लंबे समय तक जुड़ा रहेगा।
विपक्ष का पक्ष: एजेंडा कुछ और है
दरअसल, यह पूरा विवाद सिर्फ एक बिल तक सीमित नहीं है। इसके पीछे महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं। सरकार इस संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना चाहती थी, ताकि भविष्य में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सके। लेकिन विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए यह रास्ता जरूरी नहीं है।
विपक्ष का तर्क साफ है कि मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण लागू किया जा सकता है, इसके लिए परिसीमन या सीटों की संख्या बढ़ाने की जरूरत नहीं है। यही वजह रही कि विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया और वोटिंग में सरकार को जरूरी समर्थन नहीं मिला।
वोटिंग के आंकड़े क्या कहते हैं
वोटिंग के आंकड़े इस पूरे विवाद को साफ दिखाते हैं। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है, जो इस स्थिति में सरकार के पास नहीं था। नतीजा यह हुआ कि बिल गिर गया।
राजनीतिक बयानबाजी ने बढ़ाया तापमान
बिल गिरने के बाद बीजेपी के कई नेताओं ने इसे महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर विपक्ष पर हमला किया। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक विधेयक का विरोध नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के साथ अन्याय है।
दूसरी तरफ विपक्ष यह कह रहा है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ाना चाहती है। उनका आरोप है कि इस पूरे मुद्दे को इस तरह पेश किया जा रहा है ताकि जनता के बीच एक खास नैरेटिव बनाया जा सके।
क्या यह सिर्फ कानून नहीं, रणनीति थी
इस पूरे घटनाक्रम का एक और पहलू है, जो कम चर्चा में है लेकिन उतना ही अहम है। वह है राजनीतिक संदेश। कई बार ऐसे बिल सिर्फ पास कराने के लिए नहीं, बल्कि एक संदेश देने के लिए भी लाए जाते हैं। इससे यह दिखाया जाता है कि कौन किस मुद्दे के साथ खड़ा है।
यहीं पर यह सवाल भी उठता है कि क्या यह बिल पहले से ही एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। क्योंकि जब संख्या बल साफ तौर पर कम था, तब भी इसे विशेष सत्र में लाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि शायद मकसद सिर्फ कानून बनाना नहीं, बल्कि राजनीतिक माहौल बनाना भी था।
आगे क्या होगा
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे को दोनों पक्ष कैसे आगे बढ़ाते हैं। क्या सरकार इसे फिर से किसी नए तरीके से सामने लाएगी, या विपक्ष इसे अपने तरीके से जनता के बीच ले जाएगा। एक बात साफ है कि महिलाओं का मुद्दा अब आने वाले समय में राजनीति के केंद्र में रहने वाला है।
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