Ancient Indian Construction Technology: बिना सीमेंट की इमारतें सदियों तक कैसे टिकी रहीं?
Ancient Indian construction technology: जानिए बिना cement की इमारतें सदियों तक कैसे टिकी रहीं। lime mortar, surkhi और देसी विज्ञान की पूरी कहानी।
आज के समय में करोड़ों रुपये का फ्लैट खरीदने के कुछ ही साल बाद दीवारों में सीलन, प्लास्टर गिरना और छत से पानी टपकना आम समस्या बन चुकी है। इसके ठीक उलट, भारत में मौजूद हज़ार साल पुराने किले, मंदिर और बावड़ियाँ आज भी मौसम की मार झेलते हुए मजबूती से खड़ी हैं।
यह विरोधाभास एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—
जब आधुनिक cement concrete कुछ दशकों में कमजोर पड़ जाता है, तो बिना सीमेंट बनी प्राचीन भारतीय इमारतें सदियों तक कैसे सुरक्षित रहीं?
इस सवाल का जवाब छिपा है भारत की Ancient Indian construction technology में।
Cement से पहले क्या इस्तेमाल होता था?
सीमेंट के आने से बहुत पहले भारत में इमारतों को जोड़ने के लिए जिस गारे का उपयोग किया जाता था, उसे प्राचीन ग्रंथों में Vajra Lep कहा गया है।
“वज्र” यानी कठोर और “लेप” यानी परत— ऐसा लेप जो पत्थर जैसा मजबूत हो।
इस तकनीक की नींव थी lime mortar, जिसे चूना पत्थर (limestone) से तैयार किया जाता था।
Lime Mortar कैसे बनाया जाता था?
प्राचीन काल में limestone को भट्टियों में जलाया जाता था, फिर उसमें पानी मिलाकर slaked lime तैयार किया जाता था।
लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या थी—
चूना हवा के संपर्क में आए बिना पूरी तरह सख्त नहीं होता।
अब सोचिए:
- पहाड़ों पर बने किले
- नदी किनारे बने मंदिर
- मोटी दीवारों वाले भवन
इन जगहों पर हवा अंदर तक पहुँच ही नहीं पाती।
यहीं हमारे पूर्वजों ने विज्ञान और अनुभव के मेल से अनोखा समाधान निकाला।
Surkhi: देसी जुगाड़ जिसने इतिहास बदल दिया
कारीगरों ने ईंटों को पीसकर बारीक पाउडर बनाया, जिसे कहा गया— surkhi।
जब lime + surkhi को मिलाया गया, तो एक ऐसा मिश्रण बना जो हवा के बिना भी सख्त हो सकता था, यहाँ तक कि पानी के अंदर भी।
यही कारण है कि:
- नदी किनारे बने किले
- बावड़ियाँ
- जल संरचनाएँ
आज भी बाढ़ और नमी में सुरक्षित हैं।
जब कारीगर थे Engineer भी और Chemist भी
प्राचीन भारतीय कारीगर सिर्फ निर्माणकर्ता नहीं थे, बल्कि वे व्यवहारिक रसायनज्ञ भी थे।
उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों के अनुसार गारे की रेसिपी बदली।
दक्षिण भारत में urad dal को पीसकर मसाले में मिलाया जाता था।
उड़द की दाल में मौजूद प्राकृतिक बाइंडिंग एजेंट मिश्रण को लचीलापन देते थे।
इससे:
- दीवारों में सूक्ष्म air bubbles बनते
- तापमान में बदलाव से दरारें नहीं पड़तीं
Natural Waterproofing का देसी विज्ञान
कई किलों, तालाबों और हौजों के निर्माण में गारे में jaggery syrup (गुड़ की चाशनी) मिलाई जाती थी।
गुड़ एक प्राकृतिक waterproofing agent की तरह काम करता था।
इसके अलावा अलग-अलग जगहों पर इस्तेमाल हुआ:
- बेल का गूदा
- आँवला
- औषधीय जड़ी-बूटियाँ
- अंडे की सफेदी और जर्दी
सूखने के बाद ये सभी तत्व गारे को और अधिक घना, मजबूत और पानी-रोधी बना देते थे।
Self Healing Walls: दीवारें जो खुद को ठीक करती थीं
आधुनिक सीमेंट की एक बड़ी कमजोरी है—
एक बार दरार आई, तो समय के साथ वह बढ़ती ही जाती है।
इसके उलट lime mortar की खासियत थी self healing।
चूने में मौजूद कैल्शियम समय के साथ नमी के संपर्क में आकर दोबारा सक्रिय हो जाता था और दरारों को भर देता था।
इसीलिए प्राचीन दीवारें:
- “सांस लेती” थीं
- अंदर की नमी बाहर निकाल देती थीं
- फंगस और सीलन से बची रहती थीं
Modern Cement बनाम Ancient Technology
यह कहना गलत होगा कि सीमेंट बेकार है।
सीमेंट ने:
- आम आदमी को पक्की छत दी
- तेज़ निर्माण संभव बनाया
- शहरीकरण को गति दी
लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब हमने अपनी traditional building knowledge को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया।
आज की इमारतें:
- जल्दी बनती हैं
- लेकिन जल्दी कमजोर भी हो जाती हैं
जबकि प्राचीन निर्माण:
- धीरे-धीरे मजबूत होता था
- लेकिन पीढ़ियों तक टिकता था
क्या आज भी इस तकनीक का उपयोग संभव है?
आज कई conservation projects और heritage restorations में दोबारा lime mortar technology अपनाई जा रही है।
वैज्ञानिक शोध भी मानते हैं कि यह तकनीक:
- पर्यावरण के लिए बेहतर
- अधिक sustainable
- और लंबे समय में किफायती
हो सकती है।
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