
Ankita Bhandari murder case: उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों में हुआ अंकिता भंडारी हत्याकांड सिर्फ एक अपराध नहीं था, बल्कि यह उस सच्चाई का आईना बन गया, जिसमें एक आम लड़की की आवाज़ कितनी आसानी से दबा दी जाती है। 11 नवंबर 2003 को जन्मी अंकिता, पौड़ी गढ़वाल जिले की रहने वाली थीं। सपने साधारण थे—खुद के पैरों पर खड़ा होना, परिवार को सहारा देना और एक बेहतर ज़िंदगी जीना। लेकिन 18 सितंबर 2022 को उनकी ज़िंदगी बेरहमी से छीन ली गई।
अंकिता ने इंटरमीडिएट के बाद देहरादून से होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया और 28 अगस्त 2022 को वनंतरा रिज़ॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी शुरू की। यह रिज़ॉर्ट ऋषिकेश के पास यमकेश्वर क्षेत्र में स्थित था। नौकरी के कुछ ही दिनों बाद अंकिता को वहां मानसिक दबाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
“एक्स्ट्रा सर्विस” का दबाव और विरोध
जांच में सामने आया कि अंकिता पर एक कथित वीआईपी मेहमान को “एक्स्ट्रा सर्विस” देने का दबाव बनाया जा रहा था। इसके बदले ₹10,000 की बात कही गई। अंकिता ने इसका साफ़ विरोध किया। यही विरोध आगे चलकर उसकी मौत की वजह बन गया—ऐसा परिवार और कई सामाजिक संगठन मानते हैं।
18 सितंबर को जब अंकिता ने अपने माता-पिता का फोन नहीं उठाया, तो चिंता बढ़ी। परिवार ने रिसॉर्ट में खोजबीन की, लेकिन वह नहीं मिली। उसी दिन उसके दोस्त पुष्प दीप कुमार को भी शक हुआ, क्योंकि अंकिता ने पहले उससे उत्पीड़न की बात कही थी। गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई, लेकिन शुरुआती दो दिनों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
हत्या का खुलासा और गिरफ्तारियां
बाद में मामला लक्ष्मण झूला पुलिस को सौंपा गया। पूछताछ के दौरान तीन आरोपियों—पुलकित आर्य (रिज़ॉर्ट मालिक), अंकित गुप्ता (सहायक प्रबंधक) और सौरभ भास्कर (मैनेजर)—को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, पूछताछ में तीनों ने अपराध कबूल किया।
आरोप है कि बहस के बाद अंकिता को चिल्ला नहर में धक्का दे दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। 24 सितंबर 2022 को अंकिता का शव बरामद हुआ। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण डूबना बताया गया, लेकिन शरीर पर चोटों के निशान भी मिले, जिससे कई सवाल खड़े हुए।
बुलडोज़र कार्रवाई और सबूतों पर सवाल
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया, जब उसी रात वनंतरा रिज़ॉर्ट पर बुलडोज़र चलाया गया। सरकार की तरफ से इसे अवैध निर्माण पर कार्रवाई बताया गया, लेकिन पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों ने इसे सबूत मिटाने की कोशिश कहा। अंकिता के परिवार ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर भी असंतोष जताया और अंतिम संस्कार रोकने का फैसला लिया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आश्वासन के बाद 25 सितंबर को श्रीनगर के एनआईटी घाट पर अंकिता का अंतिम संस्कार किया गया। पूरे राज्य में आक्रोश था—सड़कों पर कैंडल मार्च, धरना-प्रदर्शन और “न्याय दो” की मांग गूंज रही थी।
वीआईपी एंगल और सीबीआई जांच की मांग
सबसे बड़ा सवाल उस कथित वीआईपी को लेकर उठा, जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया गया था। सोशल मीडिया, चैट्स और गवाहियों में वीआईपी का ज़िक्र आया, लेकिन एसआईटी ने कहा कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले। इसी वजह से जनता का एक बड़ा वर्ग सीबीआई जांच की मांग करता रहा।
राजनीति भी इस मामले में खुलकर सामने आई। कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल और कई सामाजिक संगठनों ने सरकार पर आरोपियों को बचाने का आरोप लगाया, वहीं भाजपा ने मामले में दुष्प्रचार की बात कही। ऑडियो क्लिप, बयान और आरोप-प्रत्यारोप ने मामले को और जटिल बना दिया।
आज भी बाकी है सबसे बड़ा सवाल
अंकिता भंडारी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसके सवाल ज़िंदा हैं।
क्या उसे पूरा न्याय मिला?
क्या सच में हर पहलू की निष्पक्ष जांच हुई?
और सबसे अहम—क्या किसी आम लड़की की “ना” कहना अब भी सुरक्षित है?
अंकिता हत्याकांड हमें याद दिलाता है कि न्याय सिर्फ अदालतों में नहीं, बल्कि सिस्टम की ईमानदारी में भी होता है। जब तक हर सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक अंकिता सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक अधूरी लड़ाई बनी रहेगी।
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