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OBC आरक्षण लागू होते ही संसद घेरने पहुंचे 10 हजार स्टूडेंट, 65 ने दी जान

दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में हजारों छात्र भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनमें से ही एक दल में दिल्ली यूनिवर्सिटी साउथ देशबंधु कॉलेज के छात्र थे। उनके हाथ में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था ‘वीपी सिंह मुर्दाबाद, मंडल कमीशन डाउन-डाउन’।

तभी आंदोलनकारियों की भीड़ से एक स्‍टूडेंट उठा और उसने खुद पर मिट्टी का तेल छिड़क लिया। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही उसने खुद को आग के हवाले कर दिया। आसपास के छात्रों को लगा कि विरोध में पुतला जलाया जा रहा है। जब तक नजदीक खड़े लोग उसकी मदद करते, तब तक वो आधे से ज्यादा जल चुका था।

22 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज में प्रदर्शन शुरू हुए

दिल्ली यूनिवर्सिटी के बाद जेएनयू, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी समेत 22 यूनिवर्सिटी में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए।

वरिष्ठ पत्रकार अली अनवर बताते हैं, ‘जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई तब हिंदी पट्टी में विरोध जोरों पर था। न सिर्फ हिंदू, बल्कि मुस्लिम वर्ग भी इस विरोध में शामिल था। वीपी सिंह जो 1989 से पहले ‘राजा नहीं फकीर हैं’ के नारे से पहचाने जा रहे थे, अब सवर्ण छात्र उन्‍हें ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है’ कहने लगे थे।

लगभग 2 हफ्तों तक यूनिवर्सिटीज में छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा, मगर इसका कोई खास असर नहीं हुआ। आर. स्वामीनाथन ने अपने लेख यंग मैन एट वैरिकेट्स में लिखा है, ‘छात्र सड़कों, चौराहों पर, बसों पर चढ़कर विरोध प्रदर्शन करते थे। कुछ छात्र लोगों को ये समझाने के लिए भी जुटते थे कि वे मंडल कमीशन का विरोध क्यों कर रहे हैं, लेकिन इस विरोध का सरकार पर कोई खास असर नहीं दिखाई दे रहा था।

संसद घेरने पहुंचे 10 हजार स्‍टूडेंट्स

छात्रों को अब लगा कि उनके अनशन और आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इसके चलते 24 अगस्त 1990 को संसद घेरने की तैयारी की गई। हजारों की संख्या में छात्र हॉस्टल और यूनिवर्सिटीज से निकलकर संसद की तरफ बढ़े।

छात्र-छात्राएं बसों पर बैठकर, सड़कों पर हाथ में स्लोगन लेकर चले जा रहे थे। जब इसकी भनक प्रशासन को हुई, तो पुलिस फौरन छात्रों को रोकने पहुंच गई। पुलिस ने इससे पहले तक पूरे आंदोलन में छात्रों पर बल प्रयोग नहीं किया था।

आंदोलन में छात्र पुलिस के सामने बार-बार दोहराते ‘अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है’। मगर संसद के बाहर इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को देखकर पुलिस ने लाठियां उठा लीं। पहली बार आंदोलनकारी छात्रों पर लाठी, डंडे और आंसू गैस के गोले बरसाए गए।

छात्रों को पकड़कर बसों में भरा गया और दिल्ली के छत्रपाल स्टेडियम ले जाया गया। ये खबर अगले दिन के सभी बड़े अखबारों के फ्रंट पेज पर थी।

पुलिस फायरिंग में 2 छात्र मारे गए

15 अक्टूबर 1990 को इंडिया टुडे में छपी एक खबर के अनुसार, दिल्‍ली में आंदोलनकारी छात्रों ने एक बड़े चौराहे को बंद कर दिया। इसे कुर्बानी चौक का नाम दिया। छात्रों ने कई दिनों तक ट्रैफिक जाम रखा। आखिरकार भारी संख्या में पहुंचे पुलिसकर्मियों ने चौक को खाली कराया और लगभग एक हजार छात्रों को गिरफ्तार कर लिया।

अगले दिन छात्रों ने चौक पर दोबारा कब्जा करने की कोशिश की तो पुलिस से उनकी तीखी झड़प हुई। जब लाठीचार्ज और आंसू गैस से भी छात्र नहीं हटे, तो पुलिस ने गोलियां चला दीं। इसमें दो लोग मारे गए।

छात्रों को रोकने के लिए सेना को लगाया

चंडीगढ़ में भी आंदोलन कर रहे छात्रों ने सैकड़ों सरकारी गाड़ियों, इमारतों और दफ्तरों में आग लगा दी। छात्र इतना बेकाबू हो गए कि सेना को बुलाना पड़ा। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ये पहला मामला था जब सेना को बुलाया गया। फौज को अंबाला, सिरसा, कुरुक्षेत्र और रोहतक सहित लगभग एक दर्जन अन्य शहरों में तैनात किया गया था।

आरक्षण विरोधियों ने वीपी सिंह और राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को संकेत दिया था कि उनका इरादा पीछे हटने का नहीं है। किताब ‘द डिसरप्टर’ में देबाशीष मुखर्जी लिखते हैं कि इस आंदोलन में 152 छात्रों ने आत्महत्या करने की कोशिश की। इस आंदोलन में 65 छात्र मारे गए।

 

ये भी पढ़ें-बंगाल में PM मोदी बोले- ‘ना धर्म के आधार पर आरक्षण मिलेगा, ना राम मंदिर पर फैसला पलटेगा’

 

Shree Om Singh
Author: Shree Om Singh

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