34 मासूमों के साथ हैवानियत, कोर्ट ने सुनाई ‘मरते दम तक फांसी’! Banda Child Abuse Case का काला सच
Banda Child Abuse Case: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र से आई एक खबर ने पूरे देश को हिला दिया। बांदा की विशेष पॉक्सो अदालत ने सिंचाई विभाग के निलंबित जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को “मरते दम तक फांसी” की सजा सुनाई है। आरोप इतना भयावह था कि अदालत ने इसे “विरल से विरलतम अपराध” की श्रेणी में रखा।
यह सिर्फ एक अपराध नहीं था, बल्कि मासूम बचपन के साथ की गई ऐसी दरिंदगी थी, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
कैसे खुला राज?
CBI Investigation Case की शुरुआत अक्टूबर 2020 में हुई, जब इंटरपोल से एक अहम सूचना सीबीआई को मिली। एक पेन ड्राइव में 34 बच्चों से जुड़े 79 वीडियो और 679 अश्लील तस्वीरें पाई गईं। जांच की कड़ियां जोड़ते-जोड़ते मामला बांदा के नरैनी क्षेत्र तक पहुंच गया।
31 अक्टूबर 2020 को सीबीआई ने नई दिल्ली में केस दर्ज किया। 16 नवंबर को रामभवन को गिरफ्तार किया गया और दिसंबर में उसकी पत्नी को भी हिरासत में लिया गया। जांच में जो सच सामने आया, वह किसी डरावनी फिल्म की कहानी जैसा लगा—लेकिन यह कड़वी हकीकत थी।
दस साल तक चलता रहा गंदा खेल
जांच में सामने आया कि रामभवन करीब एक दशक से बच्चों को निशाना बना रहा था। बांदा, चित्रकूट और हमीरपुर के मासूम बच्चों को लालच देकर घर बुलाता, उनके साथ घिनौना कृत्य करता और वीडियो बनाता।
आरोप है कि इन वीडियो को डार्क वेब और अन्य प्लेटफॉर्म पर बेचा जाता था। बताया गया कि एक वीडियो के बदले लाखों रुपये मिलते थे। विदेशों तक यह सामग्री पहुंचाई गई।
इस अपराध में उसकी पत्नी दुर्गावती भी बराबर की भागीदार थी। वह बच्चों को महंगे गिफ्ट का लालच देकर घर तक लाती थी। दोनों की कोई संतान नहीं थी, लेकिन घर में बच्चों के लिए अलग मोबाइल रखा गया था।
बच्चों की हालत देख कांप उठे डॉक्टर
मामले की सुनवाई के दौरान 74 गवाह अदालत में पेश किए गए, जिनमें 25 पीड़ित बच्चे भी शामिल थे। दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने भी गवाही दी।
कुछ बच्चों की शारीरिक स्थिति इतनी खराब थी कि डॉक्टर भी विचलित हो गए। अदालत ने अपने फैसले में लिखा कि इन मासूमों का जीवन पूरी तरह बदल गया है। कई बच्चों को गंभीर मानसिक और शारीरिक आघात झेलना पड़ा।
अदालत का सख्त फैसला
POCSO Court Death Penalty के तहत विशेष न्यायाधीश पॉक्सो प्रदीप कुमार मिश्रा ने 163 पन्नों के अपने फैसले में कहा कि यह अपराध समाज के लिए गंभीर खतरा है और ऐसे अपराधियों के लिए कठोरतम सजा जरूरी है।
अदालत ने रामभवन पर 6.45 लाख रुपये और दुर्गावती पर 5.40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश भी दिया।
जिले में छह महीने के भीतर यह तीसरी बार है जब पॉक्सो अदालत ने मृत्युदंड सुनाया है। इससे न्यायिक सख्ती का स्पष्ट संदेश सामने आता है।
समाज के लिए बड़ा सबक
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि रामभवन को उसके दफ्तर और मोहल्ले में लोग “सीधा-सादा” व्यक्ति मानते थे। उसकी विनम्रता के पीछे ऐसा राक्षसी चेहरा छिपा होगा, यह किसी ने सोचा भी नहीं था।
यह मामला हमें सावधान करता है कि अपराधी हमेशा डरावने चेहरे के साथ नहीं आते। कई बार वे हमारे आसपास, सामान्य जीवन जीते हुए दिखाई देते हैं।
बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी है। अभिभावकों को सतर्क रहना होगा—बच्चों की गतिविधियों, मोबाइल उपयोग और अचानक मिलने वाले महंगे उपहारों पर नजर रखना जरूरी है।
अंत में…
यह फैसला सिर्फ दो दोषियों को सजा देने भर का नहीं है, बल्कि एक कड़ा संदेश है—बचपन के साथ खिलवाड़ करने वालों के लिए कोई रहम नहीं। बुंदेलखंड की इस घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। न्याय भले देर से मिला, लेकिन मिला।
मासूमों के आंसुओं का दर्द शायद कभी पूरी तरह नहीं मिटेगा, लेकिन अदालत का यह फैसला उनके जख्मों पर मरहम जैसा है। समाज को अब एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा फिर कभी ऐसी दरिंदगी का शिकार न बने।
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