दीपू के परिवार में उनकी पत्नी, बेटी और माता-पिता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
Bangladesh के मैमनसिंह ज़िले के भालुका शहर में एक फैक्ट्री की दीवार पर लगा बैनर खामोशी से एक दर्दनाक कहानी बयान करता है। बैनर पर लिखा है “हम Dipu Chandra Das की मौत से गहरे शोक में हैं।” यही वह जगह है, जहां 28 वर्षीय दीपू चंद्र दास काम करते थे और जहां से उनकी जिंदगी का अंत शुरू हुआ।
यह घटना राजधानी ढाका से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित ‘पायनियर निटवियर’ फैक्ट्री से जुड़ी है। 18 दिसंबर की रात करीब नौ बजे एक उग्र भीड़ ने दीपू को फैक्ट्री परिसर में पकड़ लिया।
दीपू चंद्र दास के परिवार से न्यूज़ एजेंसी BBC ने बातचीत की है। ये रिपोर्ट आपको विचलित कर सकती है। आइये इस रिपोर्ट को विस्तार से जानते है…
कैसे की गयी थी Dipu Chandra Das की हत्या ?
पुलिस के अनुसार, दीपू पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया था। आरोप लगते ही माहौल पल भर में हिंसक हो गया। कुछ ही मिनटों में भीड़ ने दीपू को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। मारपीट इतनी गंभीर थी कि दीपू की मौके पर ही मौत हो गई।
इतना ही नहीं, पुलिस का कहना है कि भीड़ ने शव को फैक्ट्री से लगभग एक किलोमीटर दूर ले जाकर उसमें आग भी लगा दी। जिस रास्ते से शव ले जाया गया, वहां घर और बाजार मौजूद थे, लेकिन किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया।
क्या पुलिस को पहले से खबर थी?
मैमनसिंह के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी से बातचीत में स्वीकार किया कि उस दिन इलाके में बढ़ते तनाव की सूचना उन्हें पहले ही मिल चुकी थी।
हालांकि, जब तक पुलिस मौके पर पहुंची, तब तक दीपू की मौत हो चुकी थी। पुलिस केवल उनका शव बरामद कर सकी। अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस मामले में अब तक 18 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं। जांच अभी जारी है और आगे और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
देश में पहले से था उथल-पुथल का माहौल
यह घटना ऐसे समय हुई जब Bangladesh पहले से ही राजनीतिक और सामाजिक तनाव से गुजर रहा था। कुछ दिन पहले युवा नेता शरीफ उस्मान हादी को ढाका में गोली मारी गई थी, जिनकी बाद में मौत हो गई।
इस घटना के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन और हिंसा की घटनाएं बढ़ गई थीं। शरीफ उस्मान हादी आगामी फरवरी में होने वाले चुनावों में हिस्सा लेने वाले थे।
फैक्ट्री और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
घटना के बाद कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं।
भीड़ फैक्ट्री परिसर तक कैसे पहुंची?
वहां मौजूद कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों ने क्या किया?
अगर पुलिस को पहले से तनाव की जानकारी थी, तो दीपू की सुरक्षा के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?
इन सवालों के जवाब अब तक सामने नहीं आ पाए हैं।
दीपू के परिवार से क्या बातचीत हुई?
बीबीसी की टीम जब दीपू के गांव पहुंची तो वहां एक छोटे से टीन शेड वाले घर में मातम पसरा हुआ था। Dipu Chandra Das के घर की दीवारें उनकी हत्या से जुड़े पोस्टरों से भरी थीं।
21 वर्षीय पत्नी मेघना रानी गहरे सदमे में थीं। डेढ़ साल की बेटी, जिसे अपने पिता की मौत का कोई अहसास नहीं, कभी-कभी मासूमियत से मुस्कुरा देती है।
दीपू के छोटे भाई अप्पू दास ने सिर्फ इतना कहा “हमें न्याय चाहिए। मैं और कुछ नहीं कहना चाहता।”
मां का दर्द और पिता का आरोप
Dipu Chandra Das की मां शेफाली रानी अपने बेटे के आखिरी पलों का वायरल वीडियो देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं। बातचीत के दौरान वह बेसुध होकर गिर पड़ीं।
वहीं पिता रबी लाल चंद्र दास ने आरोप लगाया कि दीपू के खिलाफ धार्मिक बेअदबी का कोई सबूत नहीं है।
उन्होंने कहा, “साजिश के तहत मेरे बेटे को मार दिया गया। वहां मौजूद लोग उसे जानते थे, फिर भी किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। उसके साथ इतनी क्रूरता सिर्फ इसलिए की गई क्योंकि वह हिंदू था।”
सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह
Bangladesh की अंतरिम सरकार ने इस घटना की निंदा की है और परिवार को न्याय दिलाने का भरोसा दिया है। सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई है।
हालांकि, दीपू चंद्र दास की मौत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, भीड़ हिंसा और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब अभी बाकी हैं।
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