Bangladesh Unrest: बांग्लादेश में नहीं थम रही हिंसा! 18 दिनों में 6 हिंदुओं की हत्या, अल्पसंख्यकों में दहशत
Bangladesh Unrest: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ बढ़ती हिंसा अब केवल चिंता का विषय नहीं रही, बल्कि यह इंसानियत के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल बन चुकी है। बीते 18 दिनों में 6 हिंदुओं की हत्या ने न सिर्फ वहां की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि अल्पसंख्यक होना आज वहां कितना असुरक्षित होता जा रहा है।
इन घटनाओं की सबसे डरावनी बात यह है कि कई मामलों में मामूली आरोपों को भीड़ द्वारा हिंसा का बहाना बना लिया गया। कहीं ईशनिंदा का आरोप लगाकर जिंदा जला दिया गया, तो कहीं गोली मारकर गला रेत दिया गया। यह घटनाएं बताती हैं कि भीड़ का उन्माद किस हद तक खतरनाक हो सकता है, जब कानून और प्रशासन कमजोर पड़ जाए।
18 दिनों में 6 हत्याएं, दहशत में अल्पसंख्यक
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजधानी ढाका के बाहरी इलाकों समेत कई जिलों में हिंदुओं को निशाना बनाया गया। नरसिंगदी में किराने की दुकान चलाने वाले शरत चक्रवर्ती मणि की धारदार हथियारों से हत्या कर दी गई। वह अपनी दुकान पर थे, तभी अज्ञात हमलावरों ने हमला कर दिया। अस्पताल ले जाते वक्त उनकी मौत हो गई।
इसी तरह जशोर जिले में हिंदू पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने पहले सिर में गोलियां मारीं और फिर गला रेत दिया। ये हत्याएं सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की उजड़ी हुई दुनिया हैं, जिनका सहारा छिन गया।
विधवा महिला के साथ हैवानियत, मानवता शर्मसार
इन हत्याओं के बीच एक घटना ऐसी भी सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया। झिनैदह जिले में एक 40 वर्षीय हिंदू विधवा महिला को पेड़ से बांधकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। इतना ही नहीं, उसे अपमानित करने के इरादे से उसके बाल काट दिए गए और ठंड के मौसम में उस पर ठंडा पानी डालकर अमानवीय यातनाएं दी गईं।
पीड़िता के मुताबिक, वह बीते ढाई साल से लगातार उत्पीड़न झेल रही थी। जमीन विवाद और अकेली होने का फायदा उठाकर आरोपियों ने उस पर दबाव बनाया। जब उसने झुकने से इनकार किया, तो उसे सजा देने के लिए इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया गया। यह घटना सिर्फ एक महिला पर हुआ अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज की असफलता को दिखाती है।
सरकार की चुप्पी और उठते सवाल
इन तमाम घटनाओं के बावजूद बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार की ओर से सख्त और साफ संदेश नहीं दिया जा रहा। कई मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो रही है, जिससे अपराधियों के हौसले और बढ़ रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता बप्पादित्य बसु ने चेतावनी दी है कि अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में बांग्लादेश में हिंदुओं का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। उनका कहना है कि डर और असुरक्षा के माहौल में लोग पलायन को मजबूर हो रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी
बांग्लादेश में हो रही ये घटनाएं सिर्फ एक देश का आंतरिक मामला नहीं हैं। मानवाधिकारों की दृष्टि से यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, महिलाओं की गरिमा और कानून का राज—ये किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद होते हैं।
आज जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मानवाधिकार संगठन और पड़ोसी देश इन घटनाओं पर नजर रखें और दबाव बनाएं, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके। सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि डर के माहौल को खत्म करना सबसे जरूरी है।
आखिर सवाल यही है…
क्या किसी इंसान की पहचान उसकी आस्था बन गई है?
क्या भीड़ का गुस्सा कानून से ऊपर हो गया है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का डर खत्म नहीं होगा। और यह सिर्फ बांग्लादेश की कहानी नहीं—यह इंसानियत के लिए एक कड़ी चेतावनी है।
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