सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ़ को रद्द कर दिया।
Donald Trump vs US Supreme Court: डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के छह जजों पर अभूतपूर्व और व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए न्यायपालिका के साथ अपने टकराव को और तेज़ कर दिया है। यह विवाद उस समय भड़का जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ़ को रद्द कर दिया। इसे ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के सबसे बड़े झटकों में से एक माना जा रहा है।
शुक्रवार को आए इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति को किसी भी देश पर व्यापक और अनियंत्रित टैरिफ़ लगाने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि व्यापार नीतियों से जुड़े ऐसे बड़े फैसलों के लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों का हवाला देते हुए कई देशों पर व्यापक टैरिफ़ लगाए थे। इन टैरिफ़ का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना और व्यापार घाटे को कम करना बताया गया था। लेकिन व्यापार समूहों और कुछ राज्यों ने अदालत में याचिका दायर कर कहा कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया है।
किन जजों ने दिया बहुमत का फैसला?
इस मामले में छह जजों ने टैरिफ़ को असंवैधानिक ठहराया। इनमें तीन लिबरल और तीन कंज़र्वेटिव जज शामिल थे।
डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों द्वारा नियुक्त जजों में Elena Kagan, Sonia Sotomayor और Ketanji Brown Jackson शामिल थीं।
वहीं रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों द्वारा नियुक्त जजों में चीफ़ जस्टिस John Roberts, Neil Gorsuch और Amy Coney Barrett ने बहुमत का साथ दिया।
चीफ़ जस्टिस रॉबर्ट्स ने बहुमत का निर्णय लिखा, जिसमें राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाओं को स्पष्ट किया गया।
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सीधा हमला
फैसले के कुछ घंटों बाद व्हाइट हाउस में आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ट्रंप ने खुलकर नाराज़गी जाहिर की। करीब 45 मिनट तक चली इस ब्रीफिंग में उन्होंने जजों पर सीधे निशाना साधा।
ट्रंप ने कहा, “मुझे अदालत के कुछ सदस्यों पर शर्म आती है। उन्होंने हमारे देश के लिए सही काम करने का साहस नहीं दिखाया।”
उन्होंने बहुमत के फैसले को “गहरे तौर पर नुकसानदेह” करार दिया और संकेत दिया कि प्रशासन अन्य कानूनी रास्तों से टैरिफ़ जारी रखने की संभावनाएं तलाशेगा। हालांकि इस दौरान उनके बयान बार-बार व्यक्तिगत स्वर ले रहे थे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वे इस फैसले को केवल कानूनी चुनौती नहीं बल्कि व्यक्तिगत अपमान के रूप में देख रहे हैं।
“वे सिर्फ मूर्ख हैं” — ट्रंप
ट्रंप ने सभी छह जजों पर हमला बोलते हुए कहा कि वे “कट्टरपंथी वामपंथियों के प्रभाव में काम कर रहे हैं।” उन्होंने यहां तक दावा किया कि अदालत अपने फैसले में “विदेशी हितों” से प्रभावित हुई है, हालांकि इस दावे के समर्थन में उन्होंने कोई सबूत पेश नहीं किया।
जब एक रिपोर्टर ने इस आरोप पर विस्तार मांगा, तो ट्रंप ने जवाब देने से परहेज़ किया।
खास बात यह रही कि जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें Neil Gorsuch और Amy Coney Barrett को नियुक्त करने पर पछतावा है, तो उन्होंने सीधे तौर पर गलती मानने से इनकार किया, लेकिन उनके वोट को “शर्मनाक” बताया। यहां तक कि उन्होंने उनके परिवारों का जिक्र भी किया, जिसे अमेरिकी राजनीतिक परंपराओं में असामान्य कदम माना जाता है।
असहमति जताने वाले जजों की सराहना
वहीं तीन जजों ने राष्ट्रपति के अधिकार के समर्थन में असहमति दर्ज की। इनमें Clarence Thomas, Samuel Alito और Brett Kavanaugh शामिल हैं।
जस्टिस कावानॉ ने अपने विस्तृत असहमति नोट में कहा कि यदि सरकार को पहले से वसूले गए अरबों डॉलर के टैरिफ़ वापस करने पड़े, तो यह प्रक्रिया “भारी प्रशासनिक अव्यवस्था” पैदा कर सकती है।
ट्रंप ने इन तीनों जजों को “देश के प्रति उनकी मजबूती और समझदारी” के लिए धन्यवाद दिया और विशेष रूप से कावानॉ की प्रशंसा की।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
व्यापार और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली नहीं है, क्योंकि उन्होंने इस मुद्दे पर काफी राजनीतिक दांव लगाया था।
विश्व व्यापार संगठन के पूर्व उप महानिदेशक Alan Wm. Wolff ने कहा कि अदालत को यह अंदाजा था कि यह फैसला राष्ट्रपति के लिए कितना महत्वपूर्ण है।
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Cato Institute के व्यापार विशेषज्ञ Colin Grabow ने इसे “कानून के राज की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रपति अपनी सीमाओं से आगे बढ़ गए थे।
आगे क्या?
अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन कांग्रेस के माध्यम से नए कानून लाने की कोशिश करेगा या वैकल्पिक कानूनी प्रावधानों का सहारा लेगा।
यह मामला केवल टैरिफ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी लोकतंत्र में शक्तियों के संतुलन की परीक्षा भी बन गया है। राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच बढ़ता यह टकराव आने वाले महीनों में अमेरिकी राजनीति को और गर्मा सकता है।
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