ईरान में बड़ी संख्या में लोग इस्लाम को एक “बाहरी थोपे गए धर्म” के रूप में देखने लगे हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को इस्लाम-पूर्व पारसी विरासत से जोड़ रहे हैं
ईरान में मौजूदा सरकार के खिलाफ चल रहे व्यापक जनआंदोलन का असर केवल राजनीतिक या आर्थिक दायरे तक सीमित नहीं है। यह आंदोलन धीरे-धीरे धार्मिक पहचान और विश्वास से जुड़े सवालों तक पहुंच गया है। महंगाई और दमन के विरोध में शुरू हुआ यह उभार अब इस्लामी व्यवस्था के खिलाफ असहमति का रूप लेता दिख रहा है, जिससे वहां Ex-Muslim movement को नई गति मिली है।
ईरान में बड़ी संख्या में लोग इस्लाम को एक “बाहरी थोपे गए धर्म” के रूप में देखने लगे हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को इस्लाम-पूर्व पारसी विरासत से जोड़ रहे हैं। दिलचस्प रूप से, इसी तरह की पहचान बहस भारत में भी उभर रही है, जहां कुछ पूर्व मुस्लिम अपनी जड़ों को सनातन धर्म से जोड़कर देख रहे हैं।
भारत में सोशल मीडिया के जरिए फैल रहा विमर्श
हालांकि ईरान और भारत के हालात में एक अहम अंतर भी है। ईरान में इस्लाम के प्रति असहमति अब खुले तौर पर सड़कों और सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त की जा रही है, जबकि भारत में यह विमर्श अभी मुख्य रूप से इंटरनेट मीडिया तक सीमित है। एक्स (पूर्व में ट्विटर), यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म इस बहस के प्रमुख माध्यम बन गए हैं।
भारत में कई लोग अब भी खुलकर सामने आने से हिचकते हैं। परिवार, सामाजिक बहिष्कार और सांप्रदायिक प्रतिक्रिया का डर एक बड़ी वजह है। इसके बावजूद, हाल के वर्षों में कुछ Ex-Muslim खुलकर सार्वजनिक मंचों पर आने लगे हैं, जिससे इस आंदोलन को दृश्यता मिली है।
रामलीला मैदान से नाम बदलने की घोषणा
हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित आर्य समाज के एक कार्यक्रम में Ex-Muslim इमरोज आलम ने मंच से अपने नए नाम ‘राजन चौधरी’ को अपनाने की घोषणा की। यह घटना देशभर में चर्चा का विषय बनी।
उनके जैसे कई अन्य Ex-Muslim दावा करते हैं कि भारत में बीते कुछ वर्षों में उनकी संख्या तेजी से बढ़ी है और यह आंकड़ा एक करोड़ के पार हो सकता है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए कोई आधिकारिक या सांख्यिकीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
फिर भी, इस मुहिम से जुड़े लोगों का कहना है कि यह केवल व्यक्तिगत आस्था परिवर्तन नहीं, बल्कि एक वैचारिक बदलाव है जो धीरे-धीरे संगठित रूप ले रहा है।
केरल से उत्तर भारत तक फैली मुहिम
इस आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक, भारत में Ex-Muslim movement की शुरुआत करीब 25 वर्ष पहले केरल से हुई थी। समय के साथ यह चर्चा दक्षिण भारत से निकलकर अब उत्तर भारत तक पहुंच चुकी है।
उनका दावा है कि अब लोग न केवल व्यक्तिगत स्तर पर, बल्कि परिवार सहित मुस्लिम धर्म छोड़ने का फैसला कर रहे हैं। कुछ मामलों में यह निर्णय वर्षों के आत्ममंथन और धार्मिक अध्ययन के बाद लिया गया है।
चंडीगढ़ का उदाहरण: परिवार सहित धर्म परिवर्तन
पंजाब के चंडीगढ़ निवासी जावेद इकबाल इसका एक उदाहरण हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने अपनी पत्नी और दो किशोर बच्चों के साथ सनातन धर्म अपनाया और अपना नाम जीतेंद्र गौड़ रख लिया।
उनका कहना है, “हमारे पूर्वजों ने किसी दबाव में जो भी रास्ता चुना हो, लेकिन हमारी सांस्कृतिक जड़ें कहीं और हैं।”
जावेद बताते हैं कि उन्होंने धर्म परिवर्तन से पहले दोनों धर्मों के सिद्धांतों का अध्ययन किया। कट्टरता, महिलाओं की स्थिति, सवाल पूछने की मनाही और वैचारिक ठहराव जैसे मुद्दों ने उन्हें इस फैसले तक पहुंचाया।
हालांकि यह सफर आसान नहीं रहा। देवबंद पृष्ठभूमि से आने वाली उनकी पत्नी को समझाने में काफी समय लगा, जबकि उनके बच्चों ने इस बदलाव को अपेक्षाकृत सहजता से स्वीकार किया।
कानूनी सुरक्षा और शिक्षा पर ज़ोर
केरल के Ex-Muslim movement से जुड़े बेयान इब्राहिम का कहना है कि ईरान और भारत में मुस्लिम समाज के भीतर उठ रहे सवालों में कई समानताएं हैं। दोनों जगह इस्लामी रूढ़िवादिता के खिलाफ आवाज़ उठ रही है।
उनका मानना है कि हाल के वर्षों में भारत में Ex-Muslim को अपेक्षाकृत सकारात्मक माहौल मिला है। खुले फतवे या हमले कम हुए हैं, लेकिन अभी भी कानूनी सुरक्षा की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।
वे सरकारी नियंत्रण में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता पर भी ज़ोर देते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों को मदरसे के बजाय आधुनिक शिक्षा दी, ताकि वे सवाल पूछने और स्वतंत्र रूप से सोचने में सक्षम बन सकें।
संगठनों की भूमिका और ज़मीनी चुनौतियां
इस बदलाव में विश्व हिंदू परिषद और आर्य समाज जैसे संगठनों की भूमिका भी सामने आ रही है। जावेद इकबाल ने परिवार सहित आर्य समाज मंदिर में सनातन धर्म ग्रहण किया था।
हालांकि, धर्म परिवर्तन के बाद समस्याएं खत्म नहीं होतीं। इमरोज आलम का कहना है कि कई हिंदू मकान मालिक उनके पूर्व में मुस्लिम होने के कारण घर देने से हिचकिचाते हैं। बच्चों के भविष्य और विवाह को लेकर भी चिंताएं बनी रहती हैं।
‘समय के साथ रास्ते खुलेंगे’
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती का कहना है कि यह एक संक्रमण काल है। जैसे-जैसे Ex-Muslim movement समुदाय की संख्या और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ेगी, आपसी विवाह और सामाजिक समावेशन के रास्ते भी खुलेंगे।
उनका मानना है कि व्यवहारिक जीवन में विवाह जैसे मामलों में आर्थिक और सामाजिक स्थिरता अधिक महत्वपूर्ण होती है, और समय के साथ ये बाधाएं कम होंगी।
पहचान, आस्था और बदलाव का दौर
ईरान से भारत तक फैला यह विमर्श केवल धर्म परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह पहचान, स्वतंत्र सोच और व्यक्तिगत आस्था के अधिकार से जुड़ा व्यापक सामाजिक बदलाव है। आने वाले समय में यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा, यह काफी हद तक सामाजिक स्वीकार्यता, कानूनी ढांचे और राजनीतिक माहौल पर निर्भर करेगा।







