Guru Gobind Singh Jayanti 2026: जब गोबिंद राय बने गुरु गोबिंद सिंह, खालसा की ऐतिहासिक शुरुआत
Guru Gobind Singh Jayanti 2026: हर साल गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती सिख समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा का पर्व होती है। यह दिन साहस, समानता, धर्म और निस्वार्थ सेवा के उन मूल्यों की याद दिलाता है, जिन्हें गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पूरे जीवन में जिया और समाज को दिया। नानकशाही कैलेंडर के अनुसार यह तिथि बदलती रहती है। वर्ष 2026 में गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती 6 जनवरी को मनाई जाएगी ।
कौन थे गुरु गोबिंद सिंह जी?
गुरु गोबिंद सिंह जी सिख धर्म के दसवें और अंतिम मानव गुरु थे। वे न सिर्फ एक महान आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि निडर योद्धा, कवि, दार्शनिक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन अन्याय, अत्याचार और धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया। उनके विचार आज भी लोगों को सत्य और न्याय के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब, बिहार में हुआ था। उनके बचपन का नाम गोबिंद राय था। वे गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के इकलौते पुत्र थे। गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। मात्र नौ वर्ष की उम्र में गोबिंद राय ने गुरु पद संभाला और आगे चलकर सिख इतिहास को एक नई दिशा दी।
खालसा पंथ की स्थापना
गुरु गोबिंद सिंह जी का सबसे ऐतिहासिक योगदान 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना है। आनंदपुर साहिब में उन्होंने सभा के सामने तलवार उठाकर पूछा कि कौन धर्म की रक्षा के लिए अपना सिर देने को तैयार है। पांच साहसी पुरुष आगे आए, जिन्हें बाद में ‘पंज प्यारे’ कहा गया।
इन पांचों को अमृतपान कराया गया और उन्हें सिंह की उपाधि दी गई। यही से खालसा पंथ की शुरुआत हुई—एक ऐसा समुदाय जो संत भी है और सैनिक भी, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है और कमजोरों की रक्षा करता है।
पांच ‘क’ और सिख पहचान
गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को पांच ककार दिए, जो सिख पहचान के प्रतीक हैं—
- केश (बिना कटे बाल)
- कंघा
- कड़ा
- कच्छा
- कृपाण
ये केवल प्रतीक नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्म-सम्मान और नैतिक जीवन का संदेश हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रमुख उपदेश
गुरु गोबिंद सिंह जी के वचन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं—
- “मानस की जात सबै एकै पहचानबो” — सभी मनुष्य समान हैं।
- “जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो” — ईश्वर की प्राप्ति सच्चे प्रेम से होती है।
- “देहि शिवा बरु मोहि इहै…” — हमेशा शुभ कर्म करने की शक्ति मांगना।
- उन्होंने यह भी सिखाया कि जब सभी शांतिपूर्ण उपाय विफल हो जाएं, तब न्याय के लिए संघर्ष करना धर्म है।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती कैसे मनाई जाती है?
इस पावन दिन पर देश-विदेश के गुरुद्वारों में अखंड पाठ साहिब, कीर्तन और विशेष अरदास होती है। कई जगह नगर कीर्तन निकाले जाते हैं, जहां गुरु साहिब की शिक्षाओं का प्रचार किया जाता है।
लंगर का विशेष आयोजन होता है, जिसमें बिना किसी भेदभाव के सभी को भोजन कराया जाता है। जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े और दवाइयां बांटी जाती हैं, जिससे सेवा और करुणा का संदेश फैलता है।
सार्वजनिक अवकाश की स्थिति
गुरु गोबिंद सिंह जयंती भारत में वैकल्पिक या प्रतिबंधित अवकाश होती है। सरकारी कार्यालय और अधिकांश व्यवसाय खुले रहते हैं, लेकिन कई लोग इस दिन श्रद्धा के साथ अवकाश लेकर गुरुद्वारों में दर्शन करते हैं।
निष्कर्ष
गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन हमें सिखाता है कि साहस, सत्य और सेवा से ही समाज बदला जा सकता है। उन्होंने न केवल सिख धर्म को मजबूत पहचान दी, बल्कि पूरे मानव समाज को न्याय और समानता का रास्ता दिखाया। गुरु गोबिंद सिंह जयंती सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेने का दिन है।
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