Guwahati Child Rescue: बेड बॉक्स में छिपाकर रखी गई नाबालिग बच्ची, 6 साल बाद रेस्क्यू
Guwahati Child Rescue: असम की राजधानी गुवाहाटी से सामने आई यह खबर सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज की उस सच्चाई को उजागर करती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह मामला पढ़कर किसी का भी दिल कांप सकता है।
गुवाहाटी के पंजाबाड़ी इलाके के जूरीपार क्षेत्र में जिला श्रम टास्क फोर्स ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए 13 साल की एक नाबालिग लड़की को सुरक्षित रेस्क्यू किया। इस बच्ची को पिछले 6 साल से बंधक बनाकर एक घर में रखा गया था। सबसे डरावनी बात यह रही कि जब अधिकारी उसे ढूंढने पहुंचे, तो बच्ची को बिस्तर के डिब्बे (स्टोरेज बेड) में छिपाकर रखा गया था।
शिकायत से शुरू हुई सच्चाई की परतें
यह पूरा मामला तब सामने आया, जब स्थानीय लोगों को घर में कुछ गड़बड़ महसूस हुई। पड़ोसियों को शक था कि उस घर में एक बच्ची को छिपाकर रखा गया है और उससे जबरन काम करवाया जा रहा है। कई दिनों की चर्चा और चिंता के बाद आखिरकार इसकी शिकायत प्रशासन तक पहुंची।
इसके बाद जिला श्रम टास्क फोर्स ने एक मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में छापा मारने का फैसला किया। 1 फरवरी को टीम पंजाबाड़ी के जुरिपार इलाके में उस घर पहुंची, जहां यह बच्ची रह रही थी।
जब सच्चाई छिपाने की कोशिश हुई
जैसे ही अधिकारियों की टीम घर के अंदर दाखिल हुई, वहां मौजूद महिला, जिसका नाम अमरीन अख्तर लस्कर बताया गया है, घबरा गई। आरोप है कि उसने तुरंत बच्ची को बेड बॉक्स के अंदर छिपा दिया, उसके ऊपर गद्दा रखा और परिवार के एक सदस्य को उस पर लेटने के लिए कहा, ताकि किसी को शक न हो।
घर की तलाशी शुरू हुई। पहले कुछ मिनटों तक बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला। लेकिन अधिकारियों ने हार नहीं मानी। करीब 25 मिनट की सघन तलाशी के बाद जब बिस्तर को हटाया गया, तो अंदर से वह बच्ची मिली।
उस पल का दृश्य बेहद भावुक था। डर से कांपती बच्ची को जब बाहर निकाला गया, तो वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।
6 साल का दर्द, जो शब्दों में बयां नहीं
जिला श्रम टास्क फोर्स के अनुसार, बच्ची को करीब 6 साल पहले इस घर में लाया गया था। उस वक्त उसकी उम्र महज 7 साल थी। इतने लंबे समय तक उसे घर में बंद रखा गया, उससे जबरन घरेलू काम करवाया गया, और विरोध करने पर मारपीट भी की जाती थी।
बच्ची न तो स्कूल जा पाई, न ही एक सामान्य बचपन जी पाई। उसके लिए दिन और रात सिर्फ काम, डर और सजा में बीतते रहे।
सुरक्षित संरक्षण में भेजी गई बच्ची
रेस्क्यू के तुरंत बाद बच्ची को Protected Conservation Centres में भेज दिया गया है। वहां उसकी मेडिकल जांच, काउंसलिंग और देखभाल की जा रही है। प्रशासन ने साफ किया है कि बच्ची के भविष्य, शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सभी कानूनी प्रक्रियाएं शुरू कर दी गई हैं।
वहीं आरोपी महिला के खिलाफ बाल श्रम, बंधक बनाकर रखने और शोषण से जुड़े गंभीर आरोपों में कार्रवाई की जा रही है।
यह सिर्फ एक मामला नहीं है
यह घटना सिर्फ गुवाहाटी या असम की नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। आज भी कई घरों में मासूम बच्चों को घरेलू काम के नाम पर रखा जाता है। कई बार वे बच्चे दिखते नहीं, सुनाई नहीं देते, लेकिन अंदर ही अंदर एक लंबी यातना झेलते रहते हैं।
यह मामला बताता है कि अगर पड़ोसी सतर्क न होते, अगर उन्होंने आवाज न उठाई होती, तो शायद यह बच्ची आज भी उसी बिस्तर के डिब्बे में छिपी रहती।
समाज की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी
सरकार और प्रशासन की भूमिका अहम है, लेकिन समाज की जिम्मेदारी उससे कम नहीं।
अगर किसी घर में
- कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता
- हमेशा डरा-सहमा नजर आता है
- या जरूरत से ज्यादा काम करता दिखता है
तो चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है।
एक सवाल, जो हम सब से है
क्या हम सिर्फ खबर पढ़कर आगे बढ़ जाएंगे?
या फिर यह तय करेंगे कि हमारे आसपास कोई बच्चा इस तरह की पीड़ा न झेले?
एक शिकायत, एक फोन कॉल और थोड़ी सी सतर्कता किसी मासूम की पूरी जिंदगी बदल सकती है।
गुवाहाटी की यह बच्ची आज सुरक्षित है।
अब जिम्मेदारी हमारी है कि कोई और बच्चा बिस्तर के डिब्बे में छिपाकर जीने को मजबूर न हो।
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