Hotel Room 13 Mystery: 12 के बाद सीधा 14! आखिर 13 नंबर से इतनी दहशत क्यों?
Hotel Room 13 Mystery: क्या आपने कभी किसी होटल की लिफ्ट में 12 के बाद सीधे 14 नंबर देखा है? या फिर कमरे की चाबी पर 13 की जगह 12A लिखा पाया है? अगर हां, तो आपने अनजाने में एक ऐसे डर को देखा है जो सदियों पुराना है। सवाल सीधा है – आखिर 13 नंबर से इतनी दूरी क्यों?
Triskaidekaphobia क्या है ?
Triskaidekaphobia संख्या 13 के प्रति एक गहरा और तर्कहीन डर या अंधविश्वास है, जिसकी वजह से कई लोग इसे ‘अशुभ’ मानते हैं। यह एक ऐसा फोबिया है जिसमें लोग 13 तारीख, 13 नंबर की सीट या 13वीं मंजिल जैसी चीजों से जानबूझकर बचते हैं।
यह डर मुख्य रूप से पश्चिमी संस्कृति और ईसाई परंपराओं से जुड़ा माना जाता है, खासकर ‘द लास्ट सपर’ जैसी मान्यताओं से, जहां संख्या 13 को अशुभ घटनाओं से जोड़ा गया है।
13 से डर की शुरुआत कहाँ से हुई?
ईसाई परंपरा के अनुसार, ईसा मसीह के अंतिम भोज (Last Supper) में 13 लोग मौजूद थे। कहा जाता है कि 13वें व्यक्ति ने ही उन्हें धोखा दिया था। धीरे-धीरे 13 को विश्वासघात और दुर्भाग्य से जोड़ दिया गया।
नॉर्स पौराणिक कथाओं में भी एक कहानी मिलती है जिसमें 12 देवताओं की दावत में 13वां मेहमान बिना बुलाए पहुंचा और उसके बाद विनाश हुआ। इन कथाओं ने 13 को रहस्यमय और डरावना बना दिया।
समय के साथ यह डर समाज में फैल गया। लोग 13 तारीख, खासकर शुक्रवार को आने वाली 13 तारीख से भी डरने लगे। होटल उद्योग ने इसे गंभीरता से लिया, क्योंकि मेहमानों की सुविधा और मानसिक सुकून उनके लिए सबसे अहम है।
होटल 13 से क्यों बचते हैं?
कारण सीधा है – बिज़नेस। अगर कोई ग्राहक 13 नंबर के कमरे में रुकने से असहज महसूस करता है, तो वह कमरा बदलने की मांग करेगा या बुकिंग ही रद्द कर देगा। इससे होटल की छवि और कमाई दोनों पर असर पड़ सकता है।
इसलिए कई होटल 12 के बाद सीधे 14 नंबर लिख देते हैं। कुछ 13 की जगह 12A या M (अंग्रेजी वर्णमाला का 13वां अक्षर) का उपयोग करते हैं। लिफ्ट में भी 13वीं मंजिल का बटन नहीं होता।
कहा जाता है कि दुनिया की बड़ी लिफ्ट कंपनियों के अनुसार अधिकांश इमारतों में 13 नंबर का बटन नहीं होता। यानी यह सिर्फ कहानी नहीं, एक व्यापक चलन है।
क्या यह हर जगह सच है?
नहीं। एशिया के कई देशों में 13 को लेकर ऐसा डर नहीं है। लेकिन वहां 4 नंबर से बचा जाता है, क्योंकि कई भाषाओं में “चार” का उच्चारण “मृत्यु” जैसा लगता है।
यानि हर संस्कृति में कोई न कोई अंक ऐसा है जिससे लोग बचना चाहते हैं। यह मनोविज्ञान है – इंसान उन चीज़ों से दूरी बनाता है जिनसे उसे असहजता महसूस हो।
चंडीगढ़ का सेक्टर 13
अब बात भारत की। देश का पहला योजनाबद्ध शहर चंडीगढ़, जिसे फ्रेंच वास्तुकार ली कार्बूजियर ने डिजाइन किया। शहर को सेक्टरों में बांटा गया, लेकिन सेक्टर-13 नहीं बनाया गया।
कारण बताया गया – पश्चिमी सोच। 13 नंबर को अशुभ मानते हुए इसे नक्शे से ही हटा दिया गया। आज भी चंडीगढ़ में सेक्टर 13 नहीं है, हालांकि घरों और बाजारों में 13 नंबर मौजूद हैं।
लेकिन एक और कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है कि हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति इलाके के लोगों को कभी वादा किया गया था कि उन्हें चंडीगढ़ में एक सेक्टर दिया जाएगा – सेक्टर 13। वक्त बदला, सरकारें बदलीं, लेकिन वह वादा पूरा नहीं हुआ। और सेक्टर 13 आज भी नक्शे से गायब है।
कुछ लोग इसे अंधविश्वास मानते हैं, तो कुछ इसे अधूरे वादों का प्रतीक।
अंधविश्वास बनाम वैज्ञानिक सोच
भारत में 13 तारीख को लोहड़ी, बैसाखी या शिवरात्रि भी पड़ सकती है। हमारे यहां 13 को अशुभ नहीं माना जाता। कई लोग इसे सामान्य अंक की तरह ही देखते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि हम ऐसे वहम से बाहर निकलें। विज्ञान और तर्क के दौर में किसी अंक से डरना शायद जरूरी नहीं। लेकिन जब बात बिज़नेस और लोगों की भावनाओं की हो, तो निर्णय अक्सर भावनाओं के आधार पर लिए जाते हैं।
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