क्या कोई आम इंसान भी अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है? क्या एस्ट्रोनॉट बनना सिर्फ़ सेना के लोगों के लिए ही संभव है?
How to become an astronaut: जब भी सुनीता विलियम्स या शुभांशु शुक्ला जैसे नाम सामने आते हैं, तो निगाहें अपने आप आसमान की ओर उठ जाती हैं। ये नाम सिर्फ़ अंतरिक्ष यात्रियों के नहीं, बल्कि उन सपनों के प्रतीक हैं जो इंसान को धरती से परे जाने की हिम्मत देते हैं। साथ ही एक सवाल भी हर किसी के मन में उठता है—क्या कोई आम इंसान भी अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है? क्या एस्ट्रोनॉट बनना सिर्फ़ सेना के लोगों के लिए ही संभव है?
अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट किसी भी ह्यूमन स्पेस मिशन की रीढ़ होते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें अंतरिक्ष में जाने, वहां रहने, काम करने और मिशन को सफल बनाने के लिए बेहद कठिन और विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। स्पेसवॉक करना, वैज्ञानिक प्रयोग करना, सैटेलाइट या स्पेसक्राफ्ट को ऑपरेट करना और तकनीकी खराबियों से निपटना—ये सब उनके काम का हिस्सा होता है।
अलग-अलग देशों में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अलग-अलग नाम इस्तेमाल होते हैं। अमेरिका, यूरोप, जापान और कनाडा में उन्हें एस्ट्रोनॉट कहा जाता है, रूस में कॉस्मोनॉट, चीन में ताइकोनॉट और भारत में गगनयात्री।
सुनीता विलियम्स और शुभांशु शुक्ला का सफ़र
सुनीता विलियम्स की यात्रा एक अमेरिकी नेवी पायलट के तौर पर शुरू हुई, जिसने उन्हें नासा और फिर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) तक पहुंचाया। वहीं शुभांशु शुक्ला ने भारतीय वायुसेना के फ़ाइटर पायलट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और आज वे भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के लिए चुने गए चार गगनयात्रियों में शामिल हैं।
क्या एस्ट्रोनॉट बनना सिर्फ़ सेना से होकर ही संभव है?
इस सवाल का जवाब है—नहीं, लेकिन सेना से आने वालों को प्राथमिकता ज़रूर मिलती है। निम्बस एजुकेशन के फाउंडर और इसरो के पूर्व वैज्ञानिक मनीष पुरोहित बताते हैं कि एस्ट्रोनॉट बनना एक फुल-टाइम प्रोफेशन है, बिल्कुल डॉक्टर या इंजीनियर की तरह। फर्क सिर्फ़ इतना है कि इसमें जोखिम और ज़िम्मेदारी दोनों बेहद ज़्यादा होती हैं।
उनका कहना है कि फ़ाइटर पायलट पहले से ही हाई-रिस्क और हाई-स्ट्रेस माहौल में काम करने के आदी होते हैं। तेज़ रफ्तार, अचानक बदलती परिस्थितियां और सेकंड्स में फ़ैसला लेने की क्षमता—ये सभी गुण उन्हें अंतरिक्ष मिशन के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
भारत का गगनयान मिशन और चुने गए गगनयात्री
भारत 2027 तक अपना पहला मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान लॉन्च करने की तैयारी में है। इसके लिए भारतीय वायुसेना के चार अधिकारियों का चयन किया गया है—ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, प्रशांत बालाकृष्णन नायर, अजित कृष्णन और अंगद प्रताप।
इन सभी को पहले देश में और फिर रूस में करीब 13 महीने की बेहद कठोर ट्रेनिंग दी गई है। इस दौरान शारीरिक क्षमता, मानसिक मजबूती और तकनीकी समझ की कड़ी परीक्षा ली गई।
आम इंसान कैसे बन सकता है एस्ट्रोनॉट?
अगर कोई आम छात्र अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना देखता है, तो उसकी तैयारी 10वीं के बाद से ही शुरू हो जाती है। 11वीं-12वीं में साइंस स्ट्रीम (फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स) लेना अनिवार्य है। इसके बाद इंजीनियरिंग या साइंस से ग्रेजुएशन और फिर मास्टर्स या पीएचडी—खासतौर पर एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, फ़िज़िक्स, मैथ्स, बायोलॉजी या केमिस्ट्री जैसे विषयों में।
इसके बाद इसरो या किसी अन्य स्पेस एजेंसी की ओर से निकाली गई वैकेंसी के लिए आवेदन करना होता है। चयन होने पर करीब दो साल की ट्रेनिंग दी जाती है।
फिटनेस और मानसिक मजबूती क्यों है ज़रूरी?
एस्ट्रोनॉट के लिए शारीरिक फिटनेस सबसे अहम शर्तों में से एक है। ब्लड प्रेशर, आंखों की रोशनी, हाइट, वजन और एंड्यूरेंस—सब कुछ तय मानकों पर खरा उतरना चाहिए। इसके अलावा मानसिक तौर पर भी बेहद मज़बूत होना ज़रूरी है, क्योंकि अंतरिक्ष में छोटी सी गलती जानलेवा हो सकती है।
नासा और विदेशी स्पेस एजेंसियों में मौका?
नासा, रोसकॉस्मोस या यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसी संस्थाओं में काम करने के लिए आमतौर पर उसी देश की नागरिकता ज़रूरी होती है। हालांकि, ड्यूल सिटीजनशिप या विशेष सहयोग कार्यक्रमों के तहत कुछ अपवाद संभव हैं।
सैलरी और सुविधाएं
एस्ट्रोनॉट की सैलरी को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं होता, लेकिन इकोनॉमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत में एक एस्ट्रोनॉट को औसतन करीब 90 हज़ार रुपये प्रति माह सैलरी मिलती है। इसके अलावा मिशन भत्ता, बोनस, मेडिकल सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग जैसी कई सुविधाएं भी मिलती हैं।
सपना मुश्किल है, नामुमकिन नहीं
अंतरिक्ष तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन सही दिशा, कड़ी मेहनत और धैर्य के साथ यह सपना हकीकत बन सकता है। सुनीता विलियम्स और शुभांशु शुक्ला जैसे नाम यही साबित करते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो आसमान भी आख़िरी मंज़िल नहीं होता।
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