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मणिपुर में शांति समझौते के बावजूद जबरन वसूली में आया उछाल

यूएनएलएफ कैडर (Source: Quora)

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) के एक गुट के साथ शांति समझौते के तीन महीने बाद ही जबरन वसूली के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। समझौते के अनुसार, सशस्त्र समूह की निगरानी की ज़िम्मेदारी सुरक्षा एजेंसियों की है लेकिन यह अब तक संभव नहीं हो पाया है। सरकार ने अब तक कोई कैंप नामित नहीं किया है जहां सशस्त्र समूह को रखा जा सके ना ही किसी सुरक्षा एजेंसी को इस काम की ज़िम्मेदारी सौंपी है।

विद्रोही समूह के साथ शांति समझौते के बाद ही काडरों के लिए कैंप नामित कर दिये जाते हैं और उनके हथियारों और गोला बारूदों की भी नियमित जांच नामित सुरक्षा बल द्वारा की जाती है।

यूएनलएफ की स्थापना 1964 में की गई थी। यह उन 8 मैतेई उग्रवादी संगठनों में से एक है जिन्हें गृह मंत्रालय ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत गैरकानूनी घोषित किया था। मंत्रालय के अनुसार, “संगठन, देश के अंदर और बाहर, दोनों ओर सक्रिय है”।

वर्तमान में दो अस्थाई कैंपों को यूएनलएफ के काडर के लिए चिन्हित किया गया है जिसमें 400 लोगों के व्यवस्था की क्षमता है। स्थाई कैंप के अभाव में बहुत सारे सदस्य या तो अपने-अपने घरों में या फिर नागरिक क्षेत्रों में रह रहे हैं। उनके पास हथियार भी हैं।

चूंकि किसी सुरक्षा एजेंसी के पास हथियारों और गोला बारूदों के निगरानी की ज़िम्मेदारी नहीं है इसीलिए उनकी हरकतों पर निगाह रखना भी लगभग असंभव है।

नवंबर अंत में  गृहमंत्रालय द्वारा सूचित किया गया था की  यूएनएलएफ “हिंसा आंदोलन और बुनियादी ढांचे में शामिल होने” पर सहमत हो गया है। गृह मंत्री ने कुछ कैडरों द्वारा खुले मैदान में अपने हथियार समर्पण की तस्वीरें भी साझा की थीं।

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