ओडिशा में दशकों से रह रहे एक ही परिवार के 14 लोगों को कथित तौर पर भारतीय नागरिकता के पर्याप्त दस्तावेज होने के बावजूद बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया।
Indian family deported to Bangladesh: भारत-बांग्लादेश सीमा से एक बार फिर मानवाधिकार और नागरिकता से जुड़ा गंभीर मामला सामने आया है। ओडिशा में दशकों से रह रहे एक ही परिवार के 14 लोगों को कथित तौर पर भारतीय नागरिकता के पर्याप्त दस्तावेज होने के बावजूद बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया। इस परिवार में 90 साल की बुजुर्ग महिला और पांच छोटे बच्चे भी शामिल हैं, जो फिलहाल बांग्लादेश के सिलहट में बेहद दयनीय हालात में रह रहे हैं।
65 वर्षीय अलकन बीबी बांग्लादेश से फोन कर भारत में मौजूद रिश्तेदारों से मदद की गुहार लगा रही हैं। रोते हुए वे कहती हैं, “यहां न खाने को है, न रहने की जगह। हमें जबरदस्ती यहां छोड़ दिया गया है। हम भारतीय हैं, हमें वापस ले आओ, नहीं तो मर जाएंगे।”
ओडिशा पुलिस की कार्रवाई
परिजनों के मुताबिक, 8 दिसंबर को ओडिशा पुलिस ने जगतसिंहपुर जिले से अलकन बीबी, उनके पति शेख जब्बार और परिवार के अन्य सदस्यों को हिरासत में लिया। सभी को कई हफ्तों तक पुलिस कस्टडी में रखा गया। इसके बाद 26 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रास्ते उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया।
परिवार का आरोप है कि बांग्लादेशी सुरक्षाबलों ने दस्तावेज न होने की बात कहकर उन्हें वापस भारत भेज दिया था, लेकिन सीमा पर तैनात BSF ने दोबारा उन्हें “पुशबैक” कर बांग्लादेश भेज दिया। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के पांच सदस्य बिछड़ गए, जबकि नौ लोग अब भी सिलहट में फंसे हुए हैं।
“हम दशकों से भारत में हैं” – बहन का दावा
शेख जब्बार की बहन रहिमा, जो पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में रहती हैं, अपने भाई की वापसी के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनका दावा है कि उनका परिवार 1970 के दशक से ओडिशा में रह रहा है। वे वहां के रजिस्टर्ड वोटर हैं और उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और करीब 60 साल पुराने जमीन के दस्तावेज भी मौजूद हैं।
रहिमा कहती हैं, “मेरे भाई के बच्चे ओडिशा में ही पैदा हुए, वहीं बड़े हुए। फिर भी पुलिस उन्हें घुसपैठिया बता रही है। अगर ये लोग भारतीय नहीं हैं, तो फिर वोटर कार्ड और जमीन के कागज किस काम के?”
रिश्तेदारों ने जुटाए पुराने दस्तावेज
परिवार के भतीजे रहुम्मीन खान के अनुसार, पश्चिम बंगाल के साउथ 24 परगना जिले के नामखाना ब्लॉक में उनके पूर्वजों की जमीन है। उनके पास 1962 के जमीन के कागजात, पंचायत से जारी वंशावली प्रमाणपत्र और एफिडेविट मौजूद हैं।
वे बताते हैं कि शेख जब्बार का नाम 2002 की ओडिशा वोटर लिस्ट में भी दर्ज है। हालांकि, अशिक्षा के कारण कुछ दस्तावेजों में नाम और पिता के नाम की त्रुटियां थीं, जिन्हें बाद में हलफनामे के जरिए सुधारा गया।
“ठंड में सड़क पर रह रहे हैं, एजेंट मांग रहे 2 लाख रुपये”
रहुम्मीन का कहना है कि बांग्लादेश में परिवार के पास न पैसे हैं, न कोई सहारा। 90 साल की बुजुर्ग महिला चलने-फिरने में असमर्थ हैं और बच्चे ठंड में बीमार पड़ रहे हैं। स्थानीय एजेंट सीमा पार कराने के नाम पर 2 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं।
“हम किसी अनजान एजेंट को इतनी बड़ी रकम कैसे दे सकते हैं? पूरा परिवार सड़क पर भीख मांगकर पेट भर रहा है,” रहुम्मीन कहते हैं।
BSF का पक्ष क्या है?
BSF के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अवैध घुसपैठियों की पहचान और डिपोर्टेशन एक जटिल कानूनी प्रक्रिया है। अधिकारी के मुताबिक, संदिग्धों के दस्तावेजों की जांच की जाती है और जरूरत पड़ने पर बांग्लादेशी अधिकारियों से फ्लैग मीटिंग होती है।
उन्होंने कहा कि बोली, स्थानीय खुफिया जानकारी और बैक-एंड वेरिफिकेशन के जरिए अवैध नागरिकों की पहचान की जाती है। हालांकि, इस मामले पर ओडिशा पुलिस और BSF की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आया है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला मामला नहीं है। हाल ही में सोनाली खातून नाम की महिला को भी बांग्लादेशी होने के शक में भेज दिया गया था, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें 162 दिन बाद भारत वापस लाया गया। यह मामला दर्शाता है कि नागरिकता से जुड़ी गलतियों की कीमत आम लोगों को कितनी भारी पड़ रही है।
दस्तावेज होने के बावजूद क्यों डिपोर्ट?
यह मामला देश में नागरिकता सत्यापन, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि अगर किसी परिवार के पास दशकों पुराने दस्तावेज और वोटर लिस्ट में नाम मौजूद हैं, तो उन्हें किस आधार पर अवैध घुसपैठिया घोषित किया गया?
फिलहाल, परिवार की नजरें अदालत और सरकार की मदद पर टिकी हैं उम्मीद है कि वे जल्द भारत लौट सकेंगे।
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