देशभर में शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन लगातार छठे दिन भी जारी हैं और अब ये आंदोलन ईरान के पवित्र शहरों तक फैल चुके हैं।
Iran protests: ईरान में बढ़ती महंगाई, गिरती अर्थव्यवस्था और सख्त धार्मिक शासन के खिलाफ जनता का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। देशभर में शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन लगातार छठे दिन भी जारी हैं और अब ये आंदोलन ईरान के पवित्र शहरों तक फैल चुके हैं। शिया इस्लाम के प्रमुख धार्मिक केंद्र कोम में भी प्रदर्शनकारियों का सड़कों पर उतरना सरकार के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है।
ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने खुलकर राजशाही समर्थक नारे लगाए और सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ आवाज बुलंद की।
Iran protests क्यों हो रहा है?
इन प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर को राजधानी तेहरान से हुई थी, जहां व्यापारियों ने आर्थिक संकट के विरोध में बाजार बंद कर दिए थे। धीरे-धीरे यह आंदोलन अन्य शहरों में फैल गया और अब इसमें बड़ी संख्या में GenZ और युवा वर्ग भी शामिल हो चुका है।युवाओं का कहना है कि बेरोजगारी, महंगाई और भविष्य की अनिश्चितता ने उनके सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है।
अब तक 7 की मौत
प्रदर्शन के दौरान कई शहरों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। 1 जनवरी को हुई Iran protests हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि इससे एक दिन पहले 31 दिसंबर को भी गोलीबारी में एक व्यक्ति की जान गई थी। अब तक कुल 6 आम नागरिकों और एक सुरक्षा कर्मी की मौत की पुष्टि हुई है। इसके अलावा करीब 13 पुलिसकर्मी घायल बताए जा रहे हैं।
कई इलाकों में आगजनी, पत्थरबाजी और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। हालात बिगड़ने पर पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा।
रिकॉर्ड स्तर पर महंगाई और रियाल की गिरावट
Iran protests की सबसे बड़ी वजह देश की बदहाल अर्थव्यवस्था है। दिसंबर 2025 में ईरानी मुद्रा रियाल गिरकर 1.45 मिलियन प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। साल की शुरुआत से अब तक रियाल की कीमत लगभग 50% तक गिर चुकी है।
महंगाई भी चरम पर
- खाद्य वस्तुओं की कीमतों में करीब 72% की बढ़ोतरी
- दवाओं के दाम 50% तक बढ़ चुके हैं
- इसके साथ ही सरकार द्वारा 2026 के बजट में 62% टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव ने आम लोगों की नाराजगी को और हवा दी है।
राष्ट्रपति ने विदेशी साजिश का लगाया आरोप
बढ़ते विरोध को देखते हुए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान सामने आए हैं। उन्होंने इन प्रदर्शनों के लिए विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि बाहरी शक्तियां ईरान में फूट डालकर अपने हित साधना चाहती हैं।उन्होंने जनता से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि देश को अस्थिर करने की साजिशें की जा रही हैं। हालांकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह आंदोलन पूरी तरह घरेलू समस्याओं और जन असंतोष का नतीजा है।
राजशाही की वापसी की मांग
प्रदर्शनकारियों के नारों में अब एक नया राजनीतिक मोड़ साफ नजर आ रहा है। कई जगहों पर लोग निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी के समर्थन में नारे लगाते दिखे। प्रदर्शनकारी मौजूदा मौलाना शासन के अंत और राजशाही की वापसी की मांग कर रहे हैं।
47 साल पहले खत्म हुई पहलवी राजशाही के वारिस 65 वर्षीय रेजा पहलवी को प्रदर्शनकारी एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। युवाओं का मानना है कि उनके नेतृत्व में ईरान को आर्थिक स्थिरता, वैश्विक स्वीकार्यता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता मिल सकती है।
इस्लामिक क्रांति के बाद से मौलाना शासन
ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए और मौलाना शासन की नींव पड़ी। खुमैनी के निधन के बाद 1989 में अयातुल्लाह अली खामेनेई सुप्रीम लीडर बने, जो पिछले 37 वर्षों से सत्ता में हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा प्रदर्शन 2022 के महसा अमीनी आंदोलन के बाद सबसे बड़े माने जा रहे हैं। उस समय हिजाब नियमों के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में ली गई 22 वर्षीय महसा अमीनी की मौत ने देशव्यापी आंदोलन को जन्म दिया था।
तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था और बढ़ता घाटा
- ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल निर्यात पर निर्भर है।
- 2024 में कुल निर्यात: लगभग 22.18 बिलियन डॉलर
- आयात: 34.65 बिलियन डॉलर
- व्यापार घाटा: 12.47 बिलियन डॉलर
2025 में प्रतिबंधों और तेल निर्यात में गिरावट के कारण यह घाटा बढ़कर 15 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जहां करीब 90% तेल निर्यात किया जाता है।
सरकार ने नए व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय साझेदारियों की कोशिश की है, लेकिन प्रतिबंधों के चलते GDP ग्रोथ 2025 में केवल 0.3% रहने का अनुमान है।
क्या बदलाव की ओर बढ़ रहा है ईरान?
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष ने ईरान को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। अगर हालात नहीं संभले, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप ले सकता है।
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