Iran Islamic Regime Crisis: महिलाएं लड़ रही हैं आज़ादी की लड़ाई, फिर कारगिल में खामेनेई समर्थन क्यों?
Iran Islamic Regime Crisis: ईरान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे गंभीर दौर से गुजर रहा है। पिछले दो हफ्तों से ज्यादा समय से वहां लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक अब तक 2,400 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है और 18 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह आंदोलन इतना बड़ा है कि इसने ईरान के इस्लामिक शासन की नींव को हिला दिया है।
विरोध की शुरुआत और गुस्से की वजह
यह आंदोलन 28 दिसंबर को शुरू हुआ, जब राजधानी तेहरान में दुकानदार सड़कों पर उतरे। वजह थी ईरानी मुद्रा रियाल की भारी गिरावट। बीते एक साल में रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, महंगाई करीब 40 फीसदी तक पहुंच चुकी है। तेल, आटा, मांस जैसी रोजमर्रा की चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गईं।
अमेरिकी प्रतिबंध, सरकारी बदइंतजामी और भ्रष्टाचार ने हालात और बिगाड़ दिए। जल्द ही यूनिवर्सिटी के छात्र, महिलाएं और आम नागरिक भी आंदोलन में शामिल हो गए। कई शहरों में लोग खुलकर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ नारे लगाने लगे।
जनवरी के पहले हफ्ते में प्रदर्शन और तेज हुए। कई जगह ईरान के पूर्व शाह के बेटे रज़ा पहलवी के समर्थन में भी नारे लगे। यह साफ हो गया कि आंदोलन अब सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि राजनीतिक बदलाव की मांग बन चुका है।
सरकार का सख्त जवाब
ईरानी सरकार ने विरोध को बेहद सख्ती से दबाया। वाटर कैनन, रबर बुलेट और यहां तक कि असली गोलियों के इस्तेमाल की रिपोर्ट्स सामने आईं। अस्पतालों में घायलों और शवों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि हालात काबू से बाहर हो गए।
8 जनवरी से ईरान में इंटरनेट लगभग बंद है, ताकि वीडियो और तस्वीरें बाहर न जा सकें। इसके बावजूद कुछ लोग सैटेलाइट इंटरनेट के जरिए जानकारी साझा कर रहे हैं।
इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारा गया या गिरफ्तार लोगों को फांसी दी गई, तो अमेरिका “कड़ी कार्रवाई” करेगा।
और इधर कारगिल की तस्वीर
इसी बीच भारत के लद्दाख क्षेत्र के कारगिल से आई खबर ने सबको चौंका दिया। 14 जनवरी को कारगिल में ईरान और उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के समर्थन में बड़ी रैली निकाली गई।
कारगिल एक शिया बहुल इलाका है, जहां खामेनेई को धार्मिक रूप से सम्मान दिया जाता है। इस रैली में जहां ईरान के समर्थन के नारे लगे, वहीं अमेरिका और इजरायल के खिलाफ तीखा विरोध भी देखने को मिला।
ट्रंप और नेतन्याहू के ‘जनाज़े’
रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पुतले और खाली ताबूत निकाले। इनका प्रतीकात्मक रूप से ‘जनाज़ा’ भी पढ़ा गया।
लोगों ने अमेरिका-इजरायल विरोधी नारे लगाए और मिडिल ईस्ट में उनके दखल को हिंसा की वजह बताया। रैली में पुरुषों और महिलाओं, दोनों की मौजूदगी रही। पोस्टरों पर लिखा था कि कारगिल के लोग ईरान और उसके “शहीदों” के साथ एकजुटता दिखा रहे हैं।
बड़ा सवाल यहीं से उठता है
यहां सबसे अहम सवाल पैदा होता है—
जब खुद ईरान की जनता, जिसमें बड़ी संख्या में शिया मुस्लिम भी हैं, उसी शासन के खिलाफ सड़कों पर है, तो भारत के एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाके में उसी शासन का समर्थन क्यों?
मानवाधिकारों की बात करना और विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करना एक बात है। लेकिन ऐसे शासन का समर्थन करना, जिस पर अपने ही नागरिकों की हत्या और दमन के आरोप हैं, एक अलग और गंभीर मुद्दा है।
लोकतंत्र बनाम सत्ता
ईरान की सड़कों पर जो लोग उतर रहे हैं, वे किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि जबरन थोपी गई सत्ता, डर और दमन के खिलाफ लड़ रहे हैं। महिलाएं इस आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं और आज़ादी, सम्मान और अधिकार मांग रही हैं।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां लोगों की पसंद और आवाज को अहमियत दी जाती है। ऐसे में सवाल यही है—
क्या हमें सत्ता का साथ देना चाहिए, या जनता की आवाज का?
ईरान और कारगिल की ये दो तस्वीरें हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि समर्थन का मतलब क्या होना चाहिए और किसके लिए होना चाहिए।







