Makar Sankranti क्यों मनाई जाती है? जानें इतिहास, परंपराएं और रोचक तथ्य
Makar Sankranti का पावन पर्व हर साल बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। Makar Sankranti 2026 लोग 14 जनवरी और 15 जनवरी को अलग-अलग जगहों पर मना रहे हैं। यह त्योहार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के अवसर पर मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, साल भर में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं, लेकिन इनमें से सूर्य की मकर संक्रांति और कर्क संक्रांति विशेष महत्व रखती हैं। इन दोनों संक्रांतियों पर सूर्य की गति में बदलाव होता है, जो हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण माना जाता है।
मकर संक्रांति और उत्तरायण का संबंध
सूर्य की गति में बदलाव के आधार पर Makar Sankranti और कर्क संक्रांति को ‘अयन संक्रांति’ कहा जाता है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तो वह दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ता है। इसे उत्तरायण के रूप में जाना जाता है। इसी दिन को मकर संक्रांति के नाम से मनाया जाता है। उत्तरायण के दौरान सूर्य धीरे-धीरे दिन को लंबा करता है, जिससे गर्मियों की शुरुआत का भी संकेत मिलता है। इसी कारण मकर संक्रांति को ‘उत्तरायणी’ के नाम से भी जाना जाता है।
साल भर की संक्रांतियों का वर्गीकरण
हिंदू धर्मग्रंथों में साल भर की 12 संक्रांतियों को चार मुख्य प्रकार में बांटा गया है:
- अयन संक्रांति: जब सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन करता है।
- विषुव संक्रांति: मेष और तुला संक्रांति, जब दिन और रात बराबर होते हैं।
- षडशीति–मुख संक्रांति: मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि की संक्रांति।
- विष्णुपदी संक्रांति: वृष, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि की संक्रांति।
मकर और कर्क संक्रांति में विशेष धार्मिक महत्व होने के कारण इसे सभी अयन संक्रांति में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक और पौराणिक मान्यता
Makar Sankranti केवल एक मौसम या सूर्य की गति का पर्व नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते थे। इसी कारण इसे मकर संक्रांति कहा गया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी का स्नान अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। कहा जाता है कि गंगा जी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थीं। इसी वजह से मकर संक्रांति पर गंगा स्नान का विशेष महत्व है।
महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए भी मकर संक्रांति का दिन चुना था। यही नहीं, भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का नाश किया और उनके सिरों को मंदार पर्वत के नीचे दबाया। इसलिए यह पर्व बुराइयों और नकारात्मकताओं के अंत का प्रतीक भी माना जाता है।
कहा जाता है कि माता यशोदा ने जब भगवान कृष्ण के जन्म के लिए व्रत रखा, तो उस दिन मकर संक्रांति थी। इसके बाद से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन शुरू हुआ और यह आज भी कई जगहों पर मनाया जाता है।
Makar Sankranti के त्योहार विशेष
मकर संक्रांति केवल धार्मिक महत्व के कारण नहीं बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी बेहद खास है। इस दिन विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रीति-रिवाज अपनाए जाते हैं:
- कर्नाटक और महाराष्ट्र में: तिल और गुड़ का प्रसाद बांटा जाता है।
- पंजाब में: यह पर्व ‘लोहार संक्रांति’ और ‘खिचड़ी’ के रूप में मनाया जाता है।
- गुजरात में: काइट फेस्टिवल यानी पतंग महोत्सव बड़ी धूमधाम से आयोजित होता है।
- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में: इस दिन लोगों ने ‘सर्वजनिक स्नान’ और ‘भोजन वितरण’ जैसी परंपराओं को निभाया।
मकर संक्रांति का मौसम बदलते मौसम और हल्की ठंड के साथ आता है। इसलिए इसे कृषि से जुड़ा पर्व भी माना जाता है, क्योंकि यह नए फसलों की शुरुआत और खेतों की कटाई के समय के साथ मेल खाता है।
निष्कर्ष
Makar Sankranti न केवल सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है बल्कि यह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह बुराइयों के अंत, पवित्र स्नान और व्रत का पर्व है, जो समाज में भाईचारा और आपसी सहयोग को बढ़ावा देता है। इस बार भी लोग इसे उत्साह और श्रद्धा के साथ मना रहे हैं।
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