Mamata in Supreme Court: “चुनाव से पहले बंगाल को टारगेट किया जा रहा है”, SIR के नाम पर नाम कटेंगे?
Mamata in Supreme Court: नई दिल्ली से लेकर कोलकाता तक, इस वक्त एक ही सवाल गूंज रहा है— क्या पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर चुनाव से पहले बड़ा खेल हो रहा है?
इसी सवाल के जवाब की तलाश में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़ी नजर आईं। न कोई राजनीतिक भाषण, न कोई रैली—सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत में अपनी बात रखने आईं ममता।
क्या है पूरा मामला?
पश्चिम बंगाल में चल रहे SIR (Special Intensive Revision) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। ममता बनर्जी ने भी इस प्रक्रिया को चुनौती दी है।
उनका आरोप है कि
- चुनाव से ठीक पहले
- बेहद कम समय में
- बड़े पैमाने पर
मतदाता सूची से नाम हटाने की कोशिश की जा रही है।
ममता ने कोर्ट में साफ शब्दों में कहा—
“यह प्रक्रिया सिर्फ नाम काटने के लिए की जा रही है, नाम जोड़ने के लिए नहीं।”
Mamata Banerjee vs System in Supreme Court
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने सवाल उठाया कि आमतौर पर जिस प्रक्रिया को पूरा होने में सालों लगते हैं, उसे सिर्फ तीन महीनों में क्यों निपटाया जा रहा है?
उन्होंने कहा कि
- मतदाताओं से आधार के साथ अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा रहे हैं
- कहीं निवास प्रमाण पत्र मान्य नहीं
- कहीं जाति प्रमाण पत्र खारिज किए जा रहे हैं
ममता का आरोप था कि यह सब चुनाव से पहले बंगाल को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
CJI की टिप्पणी और कोर्ट का रुख
इस सुनवाई की अध्यक्षता कर रहे सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट की प्राथमिकता यह है कि
“कोई भी निर्दोष नागरिक मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।”
सीजेआई ने याद दिलाया कि 19 जनवरी को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पहले ही इस प्रक्रिया की व्यावहारिक दिक्कतों को विस्तार से कोर्ट के सामने रख चुके हैं।
जब ममता खुद बोलने पर अड़ी रहीं
कोर्ट में कई वरिष्ठ और अनुभवी वकील मौजूद थे, लेकिन ममता बनर्जी ने खुद दलीलें पेश करने की इच्छा जताई।
इस पर सीजेआई को कहना पड़ा—
“मैडम ममता, सिब्बल जैसे काबिल वकील मौजूद हैं, उन्हें भी बोलने दीजिए।”
हालांकि इसके बावजूद ममता ने अपनी बात जारी रखी और कहा कि “मैं बंगाल की मुख्यमंत्री हूं, वहां की जमीनी हकीकत मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता।”
“न्याय दरवाजे के पीछे रो रहा है”
ममता बनर्जी की दलीलें सिर्फ कानूनी नहीं, भावनात्मक भी थीं।
उन्होंने कहा—
“कई बार ऐसा लगता है कि न्याय दरवाजे के पीछे बैठकर रो रहा है।”
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को कई बार पत्र लिखे, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
BLO और माइक्रो ऑब्जर्वर को लेकर बड़ा आरोप
ममता ने आरोप लगाया कि
- SIR के दबाव में कई बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) मानसिक तनाव में हैं
- कुछ मामलों में जान जाने तक की बात सामने आई है
उन्होंने माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए और कहा कि इससे BLO पूरी तरह बेबस हो गए हैं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील राकेश द्विवेदी ने ममता के आरोपों को खारिज किया।
उन्होंने कहा कि
- माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति नियमों के तहत है
- जब राज्य प्रशासन सहयोग नहीं करता, तो आयोग को कदम उठाने पड़ते हैं
इस पर ममता ने आपत्ति जताते हुए कहा कि
“जो कहा जा रहा है, वह पूरी तरह सही नहीं है।”
कोर्ट का निर्देश और अगली सुनवाई
सुनवाई के अंत में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि
“हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।”
कोर्ट ने ममता बनर्जी से निर्देश दिया कि
- अगली सुनवाई तक
- वे ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची दें
- जिन्हें SIR प्रक्रिया में लगाया जा सकता है
इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई सोमवार तक स्थगित कर दी।
सिर्फ कानूनी मामला नहीं, राजनीतिक संदेश भी
यह सुनवाई सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित नहीं रही।
यह साफ संकेत भी है कि
- चुनाव से पहले
- मतदाता सूची जैसे मुद्दे
- अब सीधा सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हैं
ममता बनर्जी का खुद कोर्ट में उतरना यह दिखाता है कि बंगाल में SIR को लेकर लड़ाई अब राजनीतिक से आगे संवैधानिक मोड़ ले चुकी है।
अब सबकी नजरें सोमवार की सुनवाई पर टिकी हैं—
जहां तय होगा कि
SIR एक प्रशासनिक प्रक्रिया है या चुनावी रणनीति।
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