संसद से सेना तक फैला नरवणे संस्मरण विवाद
सोमवार और मंगलवार को लोकसभा का माहौल असामान्य रूप से तनावपूर्ण रहा। सदन में यह हंगामा कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण के बाद शुरू हुआ, जब उन्होंने भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (MM Naravane) की एक अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने की कोशिश की।
राहुल गांधी ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि वे एक ऐसी किताब से कुछ पंक्तियां पढ़ना चाहते हैं, जिसे सरकार अब तक प्रकाशित नहीं होने दे रही है। इसी बात पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई और सवाल उठाया कि संसद में किसी अप्रकाशित और जांचाधीन पुस्तक के अंश कैसे पढ़े जा सकते हैं।
किस किताब का ज़िक्र कर रहे थे राहुल गांधी?
राहुल गांधी MM Naravane की जिस किताब का हवाला दे रहे थे, उसका नाम ‘Four Stars of Destiny’ बताया जा रहा है। यह किताब पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल MM Naravane की आत्मकथा मानी जा रही है। राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा, “इस पत्रिका में खुद नरवणे जी कहते हैं कि यह उनका संस्मरण है, जिसे सरकार प्रकाशित नहीं होने दे रही। मैं सिर्फ पांच लाइन पढ़ना चाहता हूं।”
इस बयान के तुरंत बाद भाजपा सांसदों ने विरोध शुरू कर दिया, जिसके चलते सदन की कार्यवाही बाधित हुई।
“एक उद्धरण से क्यों डरती है सरकार?”
विरोध के बीच राहुल गांधी ने सत्ता पक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि जो लोग आतंकवाद से लड़ने की बात करते हैं, वे एक उद्धरण से डर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिससे सरकार घबरा रही है।
राहुल गांधी का यह बयान सत्ताधारी दल को और आक्रामक बना गया और हंगामा और तेज हो गया।
किताब पर जांच क्यों चल रही है?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह किताब जनवरी 2024 में प्रकाशित होने वाली थी। लेकिन उससे पहले ही भारतीय सेना ने इसके कंटेंट की जांच शुरू कर दी।
द इंडियन एक्सप्रेस की जनवरी 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस को निर्देश दिए गए थे कि जांच पूरी होने तक किताब के किसी भी हिस्से या उसकी सॉफ्ट कॉपी को सार्वजनिक न किया जाए।
बताया गया है कि इस जांच प्रक्रिया में रक्षा मंत्रालय भी किसी स्तर पर शामिल है और यह प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है।
गलवान घाटी और चीन तनाव का ज़िक्र
इंडियन एक्सप्रेस और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि किताब में पूर्वी लद्दाख में 2020 के सैन्य गतिरोध, खासकर गलवान घाटी की हिंसक झड़प, का विस्तृत विवरण है।
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, जून 2020 में पेट्रोलिंग पॉइंट-14 पर हालात चरम पर थे। चीनी सेना ने तय बफर ज़ोन खाली करने से इनकार कर दिया था। कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की, तो हिंसक संघर्ष हुआ।
MM Naravane की रणनीति और ‘ऑफेंसिव डिफेंस’
रिपोर्ट्स के अनुसार, इसी दौरान जनरल नरवणे ने भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव किया। अब तक रक्षा-आधारित नीति अपनाई जा रही थी, लेकिन उन्होंने ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ की रणनीति को लागू किया।
कैलाश रेंज पर भारतीय टैंकों की तैनाती को इस रणनीति का अहम हिस्सा माना जाता है, जिसने चीन पर दबाव बढ़ाया। नरवणे ने 16 जून 2020 को अपने सैन्य जीवन का “सबसे दुखद दिन” बताया था, जब 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए।
किताब में राजनाथ सिंह से बातचीत का ज़िक्र
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि किताब में 31 अगस्त 2020 की रात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से हुई बातचीत का जिक्र है। दिसंबर 2023 में न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने भी किताब के कुछ अंश प्रकाशित किए थे, जिनमें इस घटना का उल्लेख था। इन्हीं अंशों पर आधारित एक लेख हाल ही में कारवां मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ, जिसे राहुल गांधी संसद में पढ़ना चाहते थे।
नरवणे का सैन्य और व्यक्तिगत जीवन
जनरल एमएम नरवणे दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के 28वें प्रमुख रहे। उनके कार्यकाल में कोरोना महामारी, चीन के साथ सीमा तनाव और सैन्य सुधार जैसे कई बड़े मुद्दे सामने आए।उन्होंने पुणे के ज्ञान प्रबोधिनी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और एनडीए खड़कवासला व इंडियन मिलिट्री एकेडमी से सेना में कमीशन प्राप्त किया। उनके पिता वायुसेना में अधिकारी थे। उनकी पत्नी शिक्षिका हैं और उनकी दो बेटियां हैं।
ऐतिहासिक फैसले और सम्मान
MM Naravane के कार्यकाल में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत 11,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा प्रोजेक्ट्स शुरू हुए। इसके अलावा, एनडीए में महिलाओं को कैडेट बनने की अनुमति देना उनके कार्यकाल का ऐतिहासिक फैसला माना जाता है।
उन्हें सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल और परम विशिष्ट सेवा मेडल सहित कई बड़े सैन्य सम्मान मिल चुके हैं।
राजनीति, सुरक्षा और अभिव्यक्ति की बहस
राहुल गांधी का यह कदम जहां सरकार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है, वहीं सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है। यह विवाद अब केवल एक किताब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संसदीय अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सैन्य गोपनीयता के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन चुका है।
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