Modi Retirement Debate: 75 की उम्र पर बार-बार क्यों बोल रहे हैं RSS प्रमुख मोहन भागवत?
Modi Retirement Debate: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों ने एक बार फिर देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। वजह साफ है—भागवत लगातार रिटायरमेंट, दायित्व छोड़ने और दूसरों को अवसर देने की बात कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह खुद 75 साल की उम्र पार कर चुके हैं, और ठीक उसी उम्र को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में भागवत के शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं लगते, बल्कि उनमें एक गहरा वैचारिक संदेश छिपा दिखता है।
रिटायरमेंट की बात, लेकिन पद छोड़ने का ऐलान क्यों नहीं?
Mohan Bhagwat Statement को लेकर अक्सर चर्चा होती रही है। मोहन भागवत चाहें तो सीधे संघ प्रमुख के पद से हटने की घोषणा कर सकते हैं, लेकिन वह ऐसा नहीं करते। इसके बजाय वह अलग-अलग मंचों से यही बात दोहराते हैं—
“75 साल की उम्र में अगर शॉल ओढ़ा दी जाए, तो समझ लेना चाहिए कि अब दूसरों को मौका देने का समय आ गया है।”
दरअसल, यही वह बिंदु है जहां से संघ की सोच को समझा जा सकता है। RSS की परंपरा में व्यक्ति से ज्यादा व्यवस्था और अनुशासन को महत्व दिया जाता है।
75 साल: परंपरा या राजनीतिक दीवार?
RSS और भारतीय जनता पार्टी के भीतर 75 साल की उम्र को लंबे समय तक एक अनौपचारिक रिटायरमेंट लाइन माना जाता रहा है।
2019 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं को इसी उम्र सीमा के चलते टिकट नहीं मिला। तब पार्टी नेतृत्व ने साफ कहा था कि यह संगठन का फैसला है।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान तस्वीर बदलती दिखी। विपक्ष ने सवाल उठाया—अगर 75 साल की सीमा है, तो पीएम मोदी क्यों नहीं? जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया कि BJP के संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं और मोदी 2029 तक नेतृत्व करेंगे।
यहीं से यह मुद्दा नीति बनाम परंपरा की लड़ाई में बदल गया।
“घर से उठती आवाज़” क्यों मायने रखती है?
राजनीति में विपक्षी सवाल आम बात है, लेकिन मोहन भागवत का मामला अलग है। वह कोई बाहरी आलोचक नहीं, बल्कि RSS के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति हैं—यानी वही संगठन जिसे BJP का वैचारिक मार्गदर्शक माना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में कम से कम पांच मौकों पर भागवत रिटायरमेंट की बात कर चुके हैं।
हाल ही में मुंबई में उन्होंने कहा—
“संघ ने कहा है कि उम्र के बावजूद काम जारी रखो, लेकिन जब कहा जाएगा कि छोड़ो, तो मैं तुरंत छोड़ दूंगा।”
यह बयान साधारण नहीं है। यह बताता है कि संघ में व्यक्ति नहीं, संस्था फैसला करती है।
RSS-BJP रिश्ते: दिल और दिमाग?
RSS और BJP के रिश्ते को अक्सर दिल और दिमाग जैसा कहा जाता है। संघ वैचारिक दिशा देता है, BJP उसे राजनीतिक रूप देता है।
मोदी खुद कई बार कह चुके हैं कि संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद वह नागपुर में संघ मुख्यालय भी गए और मोहन भागवत की मौजूदगी में RSS को “भारतीय संस्कृति का वटवृक्ष” बताया।
फिर सवाल उठता है—अगर सोच एक है, तो तनाव क्यों?
दरार की कहानी कहां से शुरू हुई?
RSS BJP Relationship को लेकर पिछले लोकसभा चुनाव से पहले एक बयान काफी चर्चा में रहा। BJP अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था—
“पार्टी अब संघ के बिना भी चुनाव लड़ सकती है।”
यह बात संघ को नागवार गुज़री और इसका असर चुनावी नतीजों में भी देखने को मिला। बाद में दोनों संगठनों के बीच फिर नजदीकियां बढ़ीं और विधानसभा चुनावों में BJP को जीत भी मिली, लेकिन दोनों के बीच की असहजता पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई।
भागवत का संदेश: पीएम मोदी के लिए?
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या मोहन भागवत प्रधानमंत्री मोदी को संकेत दे रहे हैं?
सीधे तौर पर उन्होंने कभी मोदी का नाम नहीं लिया, लेकिन बार-बार 75 साल और दायित्व छोड़ने की बात करना अपने-आप में एक वैचारिक दबाव बनाता है।
संभव है भागवत यह याद दिलाना चाहते हों कि संघ की विचारधारा में नेतृत्व स्थायी नहीं होता। समय आने पर मार्गदर्शक की भूमिका में जाना भी सेवा का ही हिस्सा है।
मोदी क्यों नहीं छोड़ना चाहते?
इसके कई संभावित कारण हो सकते हैं—
- मिशन अधूरा है
मोदी मानते हैं कि उनका राजनीतिक-वैचारिक एजेंडा अभी पूरा नहीं हुआ। - उत्तराधिकारी का सवाल
उनके बाद BJP में ऐसा चेहरा कौन होगा, जिस पर संघ और पार्टी दोनों एकमत हों—यह सवाल अब भी खुला है। - जनसमर्थन
मोदी आज भी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। चुनावी राजनीति में यह एक मजबूत तर्क है।
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