इन प्रदर्शनों के पीछे ईरान के दिवंगत शाह के निर्वासित बेटे रज़ा पहलवी को अहम भूमिका निभाने वाला बताया जा रहा है
Reza Pahlavi: ईरान की राजधानी तेहरान सहित कई बड़े शहर इन दिनों सरकार विरोधी प्रदर्शनों की चपेट में हैं। अमेरिकी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इन उग्र प्रदर्शनों में अब तक 34 प्रदर्शनकारियों और चार सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है। हालात को देखते हुए प्रशासन ने कई इलाकों में सख़्त सुरक्षा इंतज़ाम किए हैं और इंटरनेट सेवाएं बाधित किए जाने की ख़बरें भी सामने आई हैं।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार जनता की आवाज़ दबाने के लिए बल प्रयोग कर रही है, जबकि मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि हालिया कार्रवाई ने ईरान में पहले से मौजूद असंतोष को और गहरा कर दिया है।
प्रदर्शनों के पीछे निर्वासित शहज़ादा Reza Pahlavi
इन प्रदर्शनों के पीछे ईरान के दिवंगत शाह के निर्वासित बेटे रज़ा पहलवी को अहम भूमिका निभाने वाला बताया जा रहा है। रज़ा पहलवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ईरानियों से खुलकर सड़कों पर उतरने की अपील की थी। उन्होंने लिखा कि जब बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर विरोध करते हैं, तो दमनकारी ताकतों को पीछे हटना पड़ता है।
Reza Pahlavi ने यह भी दावा किया कि हाल के प्रदर्शनों में लोगों की भागीदारी अभूतपूर्व रही है और सरकार इसी डर से एक बार फिर इंटरनेट बंद करने की कोशिश कर रही है, ताकि आंदोलन को कमजोर किया जा सके।
शाही जीवन से निर्वासन तक का सफ़र
Reza Pahlavi ईरान के आख़िरी शाह मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के सबसे बड़े बेटे हैं। उनका जन्म अक्टूबर 1960 में तेहरान में हुआ था। बचपन से ही उनका जीवन शाही वैभव और विशेष सुविधाओं से घिरा रहा। घर पर निजी शिक्षक थे और उन्हें कम उम्र से ही राजशाही की जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाने लगा था।
लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति ने सब कुछ बदल दिया। उस समय रज़ा अमेरिका में लड़ाकू पायलट की ट्रेनिंग ले रहे थे। क्रांति के बाद उनके पिता की सत्ता खत्म हो गई और पहलवी परिवार को देश छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा। उनके पिता को अलग-अलग देशों में शरण लेनी पड़ी और अंततः मिस्र में कैंसर से उनकी मौत हो गई।
निर्वासन के दौरान पहलवी परिवार को कई व्यक्तिगत त्रासदियों का भी सामना करना पड़ा। रज़ा की एक बहन और एक भाई ने आत्महत्या कर ली, जिससे परिवार और अधिक टूट गया। धीरे-धीरे यह राजघराना ईरान की राजनीति से लगभग ग़ायब हो गया।
राजशाही से लोकतंत्र की ओर बदली सोच
1980 में Reza Pahlavi ने काहिरा में खुद को ‘शाह’ घोषित किया था, लेकिन इस कदम का कोई खास राजनीतिक असर नहीं हुआ और उलटे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। इसके बाद वर्षों तक वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपेक्षाकृत शांत रहे।
हालांकि, हाल के वर्षों में उनकी राजनीतिक सक्रियता फिर बढ़ी है। रज़ा अब खुलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। 2025 में ईरान के खिलाफ हुए कथित इसराइली हवाई हमलों के बाद उन्होंने पेरिस में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि अगर मौजूदा ईरानी सरकार गिरती है, तो वे अंतरिम व्यवस्था में मदद करने को तैयार हैं। उन्होंने 100 दिन का एक रोडमैप भी पेश किया, जिसमें चुनाव, कानून का राज और नागरिक अधिकारों की बहाली की बात कही गई।
रज़ा का कहना है कि उनका लक्ष्य पुरानी राजशाही को वापस लाना नहीं, बल्कि सभी ईरानियों के लिए एक लोकतांत्रिक भविष्य बनाना है।
आलोचना, संदेह और समर्थन—तीनों साथ
हालांकि, Reza Pahlavi की मंशाओं को लेकर विवाद भी कम नहीं हैं। उनके आलोचक बार-बार उनके पिता के शासनकाल की सेंसरशिप और गुप्त पुलिस ‘सावक’ का ज़िक्र करते हैं, जो विरोधियों पर सख़्ती के लिए बदनाम थी। उनका सवाल है कि अगर रज़ा वास्तव में लोकतंत्र के समर्थक हैं, तो अतीत में उन्होंने खुद को शाह घोषित क्यों किया था।
वहीं, उनके समर्थक मानते हैं कि पहलवी शासन के दौर में ईरान ने आर्थिक और सामाजिक विकास किया और पश्चिमी देशों से रिश्ते बेहतर थे। यही वजह है कि निर्वासन में रहते हुए भी रज़ा आज राजशाही समर्थकों के लिए एक प्रतीक बने हुए हैं।
विरोधी गुटों को एकजुट करने की कोशिशें
Reza Pahlavi ने कई बार ईरान के अलग-अलग विरोधी गुटों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। 2013 में उन्होंने ‘नेशनल काउंसिल ऑफ ईरान’ बनाई, लेकिन आपसी मतभेदों और देश के भीतर सीमित पहुंच के कारण यह पहल सफल नहीं हो सकी। उन्होंने हमेशा हिंसक संगठनों से दूरी बनाए रखी और शांतिपूर्ण बदलाव की वकालत की।
2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद हुए देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान रज़ा फिर सुर्खियों में आए। उन्होंने खुलकर इन आंदोलनों का समर्थन किया, जिससे उनकी लोकप्रियता में कुछ हद तक इज़ाफ़ा हुआ।
भविष्य की राजनीति और अनिश्चितता
आज 65 वर्ष की उम्र में Reza Pahlavi अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी के पास रहते हैं और खुद को एक उदारवादी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ईरान का भविष्य—राजशाही हो या गणराज्य—जनमत से तय होना चाहिए।
हालांकि, ईरान के भीतर उनकी वास्तविक लोकप्रियता का आकलन करना मुश्किल है, क्योंकि स्वतंत्र सर्वे संभव नहीं हैं। समर्थक उन्हें शांतिपूर्ण बदलाव की उम्मीद मानते हैं, जबकि आलोचक कहते हैं कि लंबे निर्वासन के बाद किसी नेता के लिए ज़मीनी भरोसा हासिल करना आसान नहीं होगा।
तेहरान से उठी मौजूदा विरोध की लहर यह संकेत जरूर दे रही है कि ईरान की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रही है—और इस बार रज़ा पहलवी फिर से उस कहानी का हिस्सा बनते नज़र आ रहे हैं।
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