आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में मोबाइल फोन इंसान की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है
Telephobia: आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में मोबाइल फोन इंसान की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। एक छोटे से डिवाइस ने पूरी दुनिया को हमारी उंगलियों तक ला दिया है। सोशल मीडिया, रील्स, मैसेजिंग, वीडियो कॉल और ऑनलाइन मीटिंग्स के जरिए लोग घंटों फोन पर जुड़े रहते हैं। लेकिन इसी डिजिटल दौर में एक चौंकाने वाली समस्या तेजी से उभर रही है—फोन कॉल का डर।
कई लोग ऐसे हैं जिन्हें मैसेज करना आसान लगता है, लेकिन जैसे ही फोन कॉल आती है, उनकी धड़कनें तेज हो जाती हैं। कुछ लोग कॉल देखकर फोन साइलेंट कर देते हैं, तो कुछ देर तक स्क्रीन को देखते रहते हैं लेकिन रिसीव नहीं कर पाते। विशेषज्ञ इस स्थिति को टेलीफोबिया (Telephobia) कहते हैं।
क्या है Telephobia?
नई दिल्ली के चाइल्ड, एडोलिसेंट और फोरेंसिक साइकैटरिस्ट डॉ. आस्तिक जोशी के अनुसार, टेलीफोबिया एक तरह की एंग्जायटी डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति को फोन कॉल आने या उठाने के ख्याल से ही डर और घबराहट महसूस होने लगती है। यह डर केवल कॉल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बातचीत की सोच, जवाब देने का दबाव और सामने वाले की प्रतिक्रिया का डर भी इसमें शामिल होता है।
आज के समय में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, खासकर 18 से 35 साल की उम्र के लोगों में।
फोन कॉल से क्यों बढ़ रही है बेचैनी?
विशेषज्ञों के मुताबिक आज का व्यक्ति कई तरह के दबावों से गुजर रहा है—करियर, आर्थिक जिम्मेदारियां, रिश्ते, सोशल प्रेशर और भविष्य की अनिश्चितता। ऐसे में अचानक फोन कॉल आना लोगों को मानसिक रूप से असहज कर देता है।
फोन कॉल में तुरंत प्रतिक्रिया देनी होती है, जबकि टेक्स्ट मैसेज में सोच-समझकर जवाब देने का समय मिलता है। यही वजह है कि टेलीफोबिया से जूझ रहे लोगों को टेक्सटिंग आसान और कॉल भारी लगती है।
Telephobia के लक्षण क्या हैं?
फोन कॉल आते ही Telephobia से पीड़ित व्यक्ति का दिमाग फाइट या फ्लाइट मोड में चला जाता है। इसके कारण कई शारीरिक और मानसिक लक्षण नजर आते हैं:
- दिल की धड़कन तेज होना
- घबराहट या बेचैनी महसूस करना
- हाथ-पैर ठंडे पड़ जाना या पसीना आना
- फोन उठाने में झिझक
- कॉल आते ही फोन साइलेंट कर देना
- बार-बार यह सोचना कि कहीं कुछ गलत न बोल दें
- किसी बुरी खबर की आशंका
कुछ लोग फोन को हाथ में लेकर काफी देर तक देखते रहते हैं, लेकिन कॉल रिसीव करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
क्या यह समस्या सिर्फ इंट्रोवर्ट लोगों को होती है?
अक्सर माना जाता है कि फोन कॉल से डर सिर्फ इंट्रोवर्ट लोगों में होता है, लेकिन विशेषज्ञ इस धारणा को गलत बताते हैं। Telephobia इंट्रोवर्ट, एक्सट्रोवर्ट और एंबिवर्ट, किसी को भी हो सकता है।
इंट्रोवर्ट लोग बातचीत से पहले मन में पूरा संवाद तैयार करना पसंद करते हैं, इसलिए अचानक कॉल उन्हें असहज कर देती है। वहीं एक्सट्रोवर्ट और एंबिवर्ट लोग भी दबाव, जिम्मेदारियों और मानसिक थकान के कारण इस समस्या का शिकार हो सकते हैं।
18 से 35 साल के युवाओं में क्यों ज्यादा दिख रही है यह समस्या?
यह उम्र करियर निर्माण, नौकरी, आर्थिक स्थिरता, रिश्तों और भविष्य की योजना का समय होती है। इस दौर में मानसिक दबाव सबसे ज्यादा होता है। इसके साथ ही यह पीढ़ी डिजिटल कम्युनिकेशन की इतनी आदी हो चुकी है कि फोन कॉल पर बातचीत करना उन्हें अजीब और असहज लगने लगता है।
टेलीफोबिया का असर जिंदगी और करियर पर
टेलीफोबिया को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। इसके कारण:
- जॉब इंटरव्यू मिस हो सकते हैं
- ऑफिस के जरूरी कामों में देरी हो सकती है
- प्रोफेशनल इमेज खराब हो सकती है
- क्लाइंट या सीनियर नाराज हो सकते हैं
- निजी रिश्तों में गलतफहमी और दूरी बढ़ सकती है
टेलीफोबिया से कैसे पाएं छुटकारा?
अच्छी बात यह है कि टेलीफोबिया कोई लाइलाज समस्या नहीं है। इसे धीरे-धीरे नियंत्रित किया जा सकता है।
- शुरुआत छोटी कॉल से करें (20–30 सेकंड)
- पहले परिवार या करीबी दोस्त से बात करें
- कॉल से पहले बातचीत के 2–3 बिंदु सोच लें
- रोजाना 5 मिनट की दो छोटी कॉल करें
- खुद पर दबाव न डालें, धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ाएं
- नियमित अभ्यास से यह डर धीरे-धीरे कम होने लगता है।







