Uterine Fibroids गर्भाशय (यूटेरस) की दीवारों पर बनने वाली गैर-कैंसरस गांठें होती हैं।
जैसे ही पीरियड्स की तारीख नजदीक आती है, कई महिलाओं के मन में चिंता घर कर जाती है। कहीं फिर से अत्यधिक रक्तस्राव न हो, कहीं असहनीय पेट दर्द दोबारा न झेलना पड़े। अक्सर इन समस्याओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन बार-बार ऐसा होना सामान्य नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह Uterine Fibroids हो सकते हैं।
Uterine Fibroids गर्भाशय (यूटेरस) की दीवारों पर बनने वाली गैर-कैंसरस गांठें होती हैं। बदलती जीवनशैली, मोटापा और हार्मोनल असंतुलन के कारण महिलाओं में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जर्नल ऑफ कंटेम्पररी क्लिनिकल प्रैक्टिस (JCCP) में प्रकाशित शोध के अनुसार, 50 वर्ष की उम्र तक दुनिया भर में 10 में से 7-8 महिलाओं को कभी न कभी फाइब्रॉइड हो सकते हैं।
इस विषय पर मैक्योर हॉस्पिटल, दिल्ली की ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी और आईवीएफ विभाग की प्रमुख डॉ. गीता जैन से बातचीत के आधार पर जानते हैं फाइब्रॉइड्स से जुड़ी अहम बातें।
क्या होते हैं Uterine Fibroids?
डॉ. गीता जैन के अनुसार, फाइब्रॉइड्स मांसपेशियों और फाइब्रस टिशू से बनी गांठें होती हैं, जो गर्भाशय में या उसके आसपास विकसित होती हैं। इन्हें यूटेरिन मायोमा या लियोमायोमा भी कहा जाता है। इनका आकार मटर के दाने जितना छोटा से लेकर इतना बड़ा हो सकता है कि पेट में सूजन या उभार स्पष्ट दिखाई देने लगे।
कैसे बनते हैं फाइब्रॉइड्स?
फाइब्रॉइड बनने का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हार्मोनल बदलाव इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन फाइब्रॉइड्स की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। यही वजह है कि मेनोपॉज के बाद, जब इन हार्मोन्स का स्तर कम हो जाता है, तो कई बार फाइब्रॉइड्स का आकार भी घटने लगता है।
हर महिला में इनकी वृद्धि की गति अलग होती है। कुछ फाइब्रॉइड धीरे-धीरे बढ़ते हैं, कुछ तेजी से, जबकि कुछ लंबे समय तक एक ही आकार में बने रहते हैं।
फाइब्रॉइड्स के प्रकार
Uterine Fibroids को उनकी स्थिति के आधार पर चार मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है—
- इंट्राम्यूरल फाइब्रॉइड: गर्भाशय की मांसपेशियों की दीवार के भीतर बनते हैं। यह सबसे सामान्य प्रकार है।
- सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड: गर्भाशय की अंदरूनी परत के नीचे विकसित होते हैं, जो पीरियड्स से जुड़ी होती है।
- सबसीरोसल फाइब्रॉइड: गर्भाशय की बाहरी सतह पर बनते हैं और बाहर की ओर बढ़ते हैं। बड़े होने पर ये मूत्राशय या आंतों पर दबाव डाल सकते हैं।
- पेडन्क्युलेटेड फाइब्रॉइड: ये एक पतली डंडी (पेडिकल) के सहारे गर्भाशय से जुड़े होते हैं और अपेक्षाकृत कम पाए जाते हैं।
क्या हैं इसके लक्षण?
फाइब्रॉइड्स के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। कई बार शुरुआती चरण में कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते। लेकिन आकार बढ़ने पर ये समस्याएं हो सकती हैं—
- अत्यधिक या लंबे समय तक चलने वाले पीरियड्स
- तेज पेट या पेल्विक दर्द
- बार-बार पेशाब की इच्छा
- पेट के निचले हिस्से में भारीपन
- कमजोरी या एनीमिया
कब दिखाएं डॉक्टर को?
अगर लगातार पेल्विक दर्द बना रहे, पीरियड्स बहुत ज्यादा या दर्दनाक हों, बार-बार ब्लीडिंग हो या अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। अचानक तेज दर्द या बहुत अधिक रक्तस्राव होने पर आपात चिकित्सा सहायता जरूरी है।
जोखिम कारक
कुछ स्थितियों में फाइब्रॉइड होने की आशंका बढ़ जाती है। इनमें हार्मोनल असंतुलन, मोटापा, पारिवारिक इतिहास और अस्वस्थ जीवनशैली प्रमुख हैं। संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से जोखिम को कम किया जा सकता है।
इलाज के विकल्प
इलाज फाइब्रॉइड के आकार, संख्या, स्थान और लक्षणों पर निर्भर करता है। छोटे और बिना लक्षण वाले फाइब्रॉइड्स में नियमित जांच की सलाह दी जाती है। जरूरत पड़ने पर दवाएं, हार्मोनल थेरेपी या सर्जरी की जा सकती है।
ज्यादातर मामलों में साधारण अल्ट्रासाउंड से फाइब्रॉइड की पहचान हो जाती है। यदि स्पष्ट न दिखे तो ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड या एमआरआई की सलाह दी जाती है।
क्या फाइब्रॉइड से एनीमिया हो सकता है?
बार-बार या अधिक रक्तस्राव के कारण एनीमिया हो सकता है। हालांकि, फाइब्रॉइड आमतौर पर कैंसरस नहीं होते। दवाएं इनके लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं करतीं। इलाज के बाद भी दोबारा फाइब्रॉइड बनने की संभावना रहती है, इसलिए नियमित फॉलो-अप जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच, संतुलित जीवनशैली और चिकित्सकीय सलाह से यूटेरिन फाइब्रॉइड्स को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
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