वन अधिकार अधिनियम
तेजी से बदलते जलवायु परिदृश्य के बीच भारत में वन अधिकार अधिनियम (FRA) अब सिर्फ भूमि स्वामित्व का कानून नहीं रह गया है। यह कानून आज जलवायु परिवर्तन से निपटने, वन संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के त्रिकोण पर खड़ा दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा दौर में FRA का निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध क्रियान्वयन पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र के पालघर ज़िले से 19 जनवरी को लगभग 50 हजार आदिवासी और वनवासी लोगों ने लंबी पदयात्रा शुरू की। इस मार्च का नेतृत्व वामपंथी दल सीपीएम (CPI-M) ने किया। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में वन अधिकार कानून का सही और प्रभावी तरीके से पालन शामिल रहा।
क्या है वन अधिकार अधिनियम (FRA)?
वन अधिकार अधिनियम, 2006 को आधिकारिक रूप से Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act कहा जाता है। यह कानून ऐतिहासिक रूप से आदिवासी और पारंपरिक वनवासी समुदायों के साथ हुए अन्याय को सुधारने के उद्देश्य से लाया गया था।
औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के बाद भी कई दशकों तक वन कानूनों में इन समुदायों को अतिक्रमणकारी माना गया, जबकि वे पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर थे। FRA इस सोच को पलटते हुए अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पारंपरिक वनवासी समुदायों (OTFDs) को वैध अधिकारधारी के रूप में मान्यता देता है।
यह कानून उन लोगों पर लागू होता है जो 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों से वन भूमि पर निवास कर रहे हैं।
FRA के तहत क्या अधिकार मिलते हैं?
वन अधिकार अधिनियम के तहत तीन प्रमुख प्रकार के अधिकार दिए गए हैं:
खेती की जा रही वन भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार
जंगल, जल, चारागाह और अन्य संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार
जंगलों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार ग्राम सभा को
सरल शब्दों में कहा जाए तो यह कानून जंगलों पर नियंत्रण को दूर बैठे प्रशासन से हटाकर उन लोगों के हाथ में देता है, जिनकी आजीविका सीधे तौर पर जंगलों से जुड़ी है।
यह अधिनियम 31 दिसंबर 2007 से प्रभावी हुआ, जब लंबे समय तक आदिवासी संगठनों और नागरिक समाज ने भूमि और आजीविका अधिकारों की मान्यता की मांग की।
क्यों बढ़ा है FRA को लेकर विवाद और आंदोलन?
हाल के वर्षों में FRA के कमजोर और असमान क्रियान्वयन ने कई राज्यों में असंतोष को जन्म दिया है। बड़ी संख्या में वन अधिकार दावे अब भी लंबित हैं, जबकि कई मामलों में आवेदन खारिज किए जाने को लेकर भी विवाद हैं।
अधिकारियों का कहना है कि कानून का लाभ ज़मीनी स्तर तक समय पर नहीं पहुंच पा रहा है। इसी मुद्दे पर हाल ही में हिमाचल प्रदेश में बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने शिमला में एक समीक्षा बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि मार्च तक अधिकांश लंबित दावों का निष्पक्ष और समयबद्ध निपटारा किया जाए।
महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों में FRA को लेकर फिर से राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में FRA क्यों हो गया है और अहम?
अब इस बहस में जलवायु परिवर्तन एक बड़ा और निर्णायक पहलू बनकर उभरा है। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, जंगलों में आग और चरम मौसम की घटनाओं के बीच जंगल भारत की जलवायु रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जिन जंगलों का प्रबंधन स्थानीय और आदिवासी समुदाय करते हैं, वहां वनों का संरक्षण बेहतर होता है। ऐसे क्षेत्रों में जंगलों का पुनर्जनन तेज़ होता है और अवैध कटाई कम देखी जाती है।
FRA आज:
आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ता है
ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर कार्बन भंडारण और जैव विविधता की रक्षा करता है
यह सुनिश्चित करता है कि जलवायु नीति सामाजिक न्याय की कीमत पर न बने
अधिकार, संरक्षण और जलवायु का संगम
तेजी से गर्म होते भारत में वन अधिकार अधिनियम अब केवल भूमि अधिकारों का सवाल नहीं रहा। यह जलवायु संकट, वन संरक्षण और आदिवासी अस्मिता से सीधे तौर पर जुड़ चुका है।
यही कारण है कि देशभर में आदिवासी समुदाय इसके सही और समय पर क्रियान्वयन की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। आंदोलनकारियों और विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर FRA को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू किया जाए, तो यह न सिर्फ आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि भारत की जलवायु लड़ाई को भी मजबूती देगा।
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