Toxic Movie Review: यश का दमदार स्वैग, कहानी ने किया कन्फ्यूज!
Toxic Movie Review: यश की ‘टॉक्सिक’ एक बड़े बजट और भव्य स्तर पर बनी गैंगस्टर फिल्म है, जिसमें ड्रग्स, परिवार, बदला, धोखा और जबरदस्त एक्शन का भरपूर तड़का देखने को मिलता है। फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट शानदार है और यश का दमदार अंदाज भी बरकरार है। हालांकि, कहानी की बात करें तो फिल्म दर्शकों को बांधने के बजाय कई जगह उलझाती नजर आती है।
Toxic Movie Review: फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी 1940 के दशक के गोवा की पृष्ठभूमि में सेट है, जहां ड्रग्स के कारोबार पर अलग-अलग गैंग्स का दबदबा है। इसी दुनिया में यश का किरदार राया एक प्रभावशाली नाम बनकर सामने आता है। लेकिन परिवार के भीतर हुए धोखे और पुराने विवादों के बाद कहानी उसके बेटे टिक्का की ओर बढ़ती है, जहां बदले और गैंगवार का सिलसिला शुरू होता है।
कहानी का कॉन्सेप्ट काफी दिलचस्प है, लेकिन फिल्म में किरदारों की भरमार और कहानी की तेज रफ्तार कई बार कन्फ्यूज कर देती है। एक वक्त के बाद दर्शक कहानी पर ध्यान देने के बजाय यही समझने में उलझ सकता है कि कौन किसके साथ है और किसका किससे क्या रिश्ता है।
राया के किरदार में यश का स्वैग
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत की परफॉर्मेंस है। राया के किरदार में उनका स्वैग, लुक, बॉडी लैंग्वेज और स्क्रीन प्रेजेंस जबरदस्त नजर आता है। वहीं, टिकट के किरदार में भी यश ने अपने अंदाज में बदलाव करने की कोशिश की है और कई सीन्स में उनकी एक्टिंग खासा असर छोड़ती है।
फिल्म में नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसी शानदार फीमेल स्टारकास्ट मौजूद है। हालांकि, समस्या यह है कि इनके किरदारों को उतनी गहराई और मजबूती नहीं दी गई। इतने बड़े कलाकारों के बावजूद ज्यादातर फीमेल किरदार कहानी में यश के किरदार के इर्द-गिर्द ही सीमित नजर आते हैं।
फिल्म में डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
गीतू मोहनदास ने फिल्म को बड़े कैनवास पर पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बड़े-बड़े सेट, शानदार विजुअल्स और फिल्म की पूरी दुनिया को एक अलग पहचान देने की कोशिश साफ नजर आती है। लेकिन कई जगह ऐसा लगता है कि स्टाइल और विजुअल्स पर कहानी से ज्यादा जोर दिया गया है।
स्क्रीनप्ले काफी तेज रफ्तार से आगे बढ़ता है। एक के बाद एक नए किरदार आते हैं, एक्शन होता है, घटनाएं बदलती रहती हैं और कहानी आगे निकल जाती है। लेकिन इसी जल्दबाजी में कई घटनाओं के पीछे की वजह ठीक से समझ नहीं आती। नतीजा यह होता है कि फिल्म देखते हुए दर्शक के मन में बार-बार यही सवाल आता है – ”आखिर ये सब हो क्यों रहा है?”
‘टॉक्सिक’ में 1940 के दशक के गोवा को पर्दे पर उतारा।
सिनेमैटोग्राफी के मामले में ‘टॉक्सिक’ काफी शानदार नजर आती है। 1940 के दशक के गोवा को जिस तरह पर्दे पर दिखाया गया है, वह फिल्म की दुनिया को एक अलग ही भव्यता देता है। बड़े सेट, शानदार कॉस्ट्यूम, लाइटिंग और एक्शन सीक्वेंस मिलकर फिल्म को विजुअली रिच और स्टाइलिश बनाते हैं।
कई सीन्स को देखकर साफ महसूस होता है कि फिल्म के प्रोडक्शन और विजुअल्स पर काफी काम किया गया है। लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जहां आंखों को इसका ट्रीटमेंट काफी पसंद आता है, वहीं कहानी कई जगह दिमाग को उलझा देती है।
‘टॉक्सिक’ का म्यूजिक फिल्म की कमजोर कड़ियों में से एक कहा जा सकता है। रवि बसरूर का बैकग्राउंड स्कोर कई जगह माहौल को बेहतर बनाने के बजाय जरूरत से ज्यादा तेज और हावी महसूस होता है। वहीं, विशाल मिश्रा, रवि बसरूर और तनिष्क बागची जैसे नामों से म्यूजिक को लेकर उम्मीदें काफी ज्यादा थीं।
3 घंटे 14 मिनट की कहानी
‘टॉक्सिक’ में भव्यता की कोई कमी नहीं है। यश का स्टारडम, बड़े बजट के सेट, शानदार विजुअल्स और भरपूर एक्शन फिल्म को बड़े पर्दे का अनुभव देने की कोशिश करते हैं। लेकिन परेशानी यह है कि कहानी इन सबके मुकाबले उतनी मजबूत नजर नहीं आती।
फिल्म में यश के कई सीन्स और उनके किरदार का स्वैग जरूर प्रभावित करता है, लेकिन सिर्फ स्टार पावर के दम पर 3 घंटे 14 मिनट की कहानी को बांधे रखना मुश्किल हो जाता है। फिल्म लगातार दर्शकों को चौंकाने और प्रभावित करने की कोशिश करती है, लेकिन हर बार मनोरंजन देने में कामयाब नहीं होती।
कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक’ आंखों के लिए एक शानदार अनुभव है, लेकिन कहानी और इमोशन के स्तर पर उतनी गहरी छाप नहीं छोड़ती। फिल्म बहुत कुछ दिखाती है, मगर उसे महसूस कराने में कहीं पीछे रह जाती है।
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