India UN Human Rights Dispute: शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर कार्रवाई को लेकर भारत और संयुक्त राष्ट्र में टकराव, मानवाधिकार विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
India UN Human Rights Dispute: भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के 20 से अधिक मानवाधिकार विशेषज्ञों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित सख्त पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई है। वहीं, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में चुनिंदा तरीके से निशाना बनाए जाने और अपुष्ट आरोपों के आधार पर देश की नकारात्मक छवि पेश करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने क्यों जताई चिंता?
हिंदुस्तान टाइम्स की 21 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के 20 से अधिक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दिल्ली और अन्य जगहों पर युवाओं के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर चिंता जताई।
विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ बार-बार सख्त कार्रवाई की गई। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने, पुलिस बल के कथित अत्यधिक इस्तेमाल और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर लगी पाबंदियों से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
भारत ने चुनिंदा तरीके से निशाना बनाने पर जताई आपत्ति
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की टिप्पणी के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्राकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या किसी देश को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
भारत ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के साथ संवाद और सहयोग पारदर्शिता, निष्पक्षता तथा तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। भारत की ओर से यह भी कहा गया कि अपुष्ट आरोपों और अधूरे आंकड़ों को किसी देश के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए।
CJP के प्रदर्शन और SIR विवाद से जुड़ा है मामला
इस विवाद की पृष्ठभूमि में दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं। CJP यानी Cockroach Janta Party और अन्य समूह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और इसके संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि सूची से मृत, स्थानांतरित, दोहराए गए या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया की जा रही है और गलत तरीके से नाम हटने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति अपील कर सकते हैं। एक तरह SIR को लेकर राजनीतिक विवाद और प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई, दोनों मुद्दे अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गए हैं।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर क्या है बहस?
इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अपनी असहमति जाहिर करने का अधिकार है। मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदर्शनों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध जरूरी और परिस्थितियों के अनुपात में होने चाहिए। उन्होंने कथित अत्यधिक बल प्रयोग और मनमानी हिरासत के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
वहीं, भारत का पक्ष है कि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां कानून के अनुसार काम करती हैं और शिकायतों के निवारण के लिए देश की न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध है।
आगे क्या होगा?
भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच इस मुद्दे पर मतभेद से मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता को लेकर बहस और तेज हो सकती है। एक ओर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ कथित उल्लंघनों की जांच और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भारत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से निष्पक्षता और तथ्यों के आधार पर टिप्पणी करने की अपेक्षा कर रहा है।
