केरल की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख गठबंधनों—वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF)—के बीच घूमती रही है।
केरल की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख गठबंधनों—वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF)—के बीच घूमती रही है। लेकिन इस बार के Kerala election में तस्वीर कुछ बदली-बदली नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहली बार राज्य में एक मजबूत त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है, जिसमें भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) भी प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
तीन ध्रुवों में बंटती सियासत
पिछले दस वर्षों से Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाला LDF सत्ता में है। वहीं Indian National Congress के नेतृत्व वाला UDF लगातार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहा है। इस बार Bharatiya Janata Party भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रही है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक त्रिकोणीय मुकाबला सीमित सीटों—करीब 25 से 30—पर ही देखने को मिलेगा, जबकि अधिकांश सीटों पर अब भी पारंपरिक LDF vs UDF की सीधी टक्कर बनी हुई है।
आरोप-प्रत्यारोप से गरमाई सियासत
Kerala election प्रचार के दौरान आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। Rahul Gandhi ने आरोप लगाया कि केरल में CPM और भाजपा के बीच “गुप्त समझौता” है, जिसका उद्देश्य कांग्रेस को कमजोर करना है।
वहीं CPM नेताओं ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए पलटवार किया है। उनका कहना है कि जहां-जहां भाजपा को सफलता मिली है, वहां कांग्रेस की परोक्ष भूमिका रही है। इस तरह राजनीतिक बयानबाजी ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है।
पिनराई विजयन तीसरी बार मैदान में
Kerala election की सबसे बड़ी खासियत यह है कि Pinarayi Vijayan को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया है। इसके लिए पार्टी ने अपने दो कार्यकाल वाले नियम में ढील दी है।
पिनराई विजयन के नेतृत्व में LDF ने पिछले कार्यकाल में कोविड-19 और बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने में अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन हाल के वर्षों में सरकार पर भ्रष्टाचार और कर्ज़ बढ़ने के आरोप भी लगे हैं, जिससे सत्ता विरोधी लहर का असर देखने को मिल सकता है।
कांग्रेस की रणनीति और ‘इंदिरा गारंटी’
Indian National Congress इस बार ‘इंदिरा गारंटी’ जैसे वादों के साथ मैदान में उतरी है। Sonia Gandhi की गैरमौजूदगी में राहुल गांधी और Priyanka Gandhi Vadra ने प्रचार की कमान संभाली है।
कांग्रेस ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, युवाओं को आर्थिक सहायता और हेल्थ इंश्योरेंस जैसी योजनाओं का वादा किया है। पार्टी को उम्मीद है कि ये वादे उसे सत्ता में वापसी का मौका देंगे।
भाजपा की बढ़ती मौजूदगी
Bharatiya Janata Party ने भी इस बार केरल में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए आक्रामक प्रचार किया है। Narendra Modi ने राज्य में कई रैलियां और रोड शो किए।
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का फोकस सीमित सीटों पर है, जहां वह जीत की संभावनाएं देख रही है। पार्टी हिंदुत्व के साथ-साथ विकास और बुनियादी ढांचे के मुद्दों को भी उठा रही है।
किन मुद्दों पर टिका है Kerala election?
विशेषज्ञों के अनुसार इस चुनाव का परिणाम पांच प्रमुख कारकों पर निर्भर करेगा:
- सत्ता विरोधी लहर
- भाजपा के वोट बैंक का विस्तार
- खाड़ी देशों में काम कर रहे मलयाली लोगों पर असर
- अल्पसंख्यक वोटों का रुझान
- चुनावी वादों की विश्वसनीयता
खाड़ी देशों और वैश्विक हालात का असर
केरल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा विदेशों, खासकर खाड़ी देशों में काम कर रहे प्रवासियों पर निर्भर है। करीब 30 लाख मलयाली विदेशों में काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या संयुक्त अरब अमीरात में है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संघर्ष की स्थिति ने इन प्रवासियों के परिवारों में चिंता बढ़ा दी है। इसका असर चुनावी रुझानों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि प्रवासी भारतीयों का वोट बैंक काफी प्रभावशाली माना जाता है।
अल्पसंख्यक वोट और जातीय समीकरण
केरल में मुस्लिम और ईसाई समुदाय का वोट बैंक काफी अहम है। माना जा रहा है कि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा UDF की ओर जा सकता है, जबकि ईसाई समुदाय के भीतर अलग-अलग रुझान देखने को मिल सकते हैं।
वहीं, हिंदू समुदाय के कुछ वर्गों का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ता दिख रहा है, जिससे चुनावी समीकरण और दिलचस्प हो गए हैं।
हालांकि मुकाबला त्रिकोणीय होने की चर्चा है, लेकिन अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना कम है। मुकाबला भले ही कड़ा हो, लेकिन अंततः सरकार बनाने के लिए किसी एक गठबंधन को स्पष्ट बढ़त मिल सकती है।
यह भी पढ़े:
Social Media Trap: Kabirdham में Minor Abuse Case, शादीशुदा महिला ने नाबालिग को बनाया शिकार
Allahabad High Court का सख्त फैसला, Tenant के बहाने खत्म—अब Landlord का आदेश ही अंतिम!
