Guwahati High Court ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा है, जसिमे असम के गुवाहाटी निवासी अमीनुल हक़ को विदेशी घोषित किया गया था। अमीनुल हक़ ने अपनी भर्तुय नागरिकता साबित काने के लिए कोर्ट में 15 अलग-अलग दस्तावेज पेश किए थे। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने इन सभी दस्तावेजों को कानूनी रूप से अमान्य या नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
Foreginers Tribunal के फैसले के खिलाफ High Court अमीनुल हक़
अमीनुल हक़ गुवाहाटी के बोरबोरी इलाके में किराए के मकान में रहते हैं और दिहाड़ी मजदूरी करके अपना गुजरा करते हैं। उनका जन्म साल 1988 में हुआ था। गुवाहाटी स्तिथ फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने 28 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में उन्हें विदेशी घोषित कर दिया था। इसी फैसले के खिलाफ उन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी।
अमीनुल हक़ ने कोर्ट को बताया की नदी के कटाव यानि रिवर इरोजन की वजह से उनके परिवार को बार-बार अपना गांव बदलना पड़ा। उनका परिवार अहले चराई खसरा गांव में रहता था, फिर धोबाकुरा, इसके बाद घुगूदोबा और आखिर में हाशदोबा गांव में जाकर बसा।
15 Documents में NRC से लेकर PAN Card तक शामिल
नागरिकता साबित करने के लिए अमीनुल हक़ ने कोर्ट में जो दस्तावेज पेश किए, उनमें साल 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन(NRC) की कंप्यूटराइज्ड कॉपी शामिल थी, जिसमे उनके पिता और उनके दादा-दादी के नाम दर्ज थे। इसके अलावा साल 1966 से 2017 तक की वोटर लिस्ट की प्रमाणित प्रतियां, साल 1973 का जमीन खरीद का मूल दस्तावेज जो उनके दादा के नाम पर था, साल 2017 का स्कूल का सर्टिफिकेट, पैन कार्ड और वोटर आईडी यानि EPIC भी शामिल थे। उन्होंने अपने पिता के मौखिक गवाही भी कोर्ट में पेश की थी। अमीनुल हक़ ने दलील दी की उनके पिता और दादा के नाम में जो थोड़ा बहुत अंतर है, वह सिर्फ स्पेलिंग की गलती है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सिराजुल हक़ बनाम असम राज्य मामले, (2019) 5 SSC 534 का हवाला भी दिया, जिसमें कहा गया था की नाम में मामूली अंतर होने से किसी की नागरिकता ख़ारिज नहीं की जा सकती।
NRC 1951 और स्कूल सर्टिफिकेट कोर्ट ने किया ख़ारिज
जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की बेंच ने कहा की 1951 का NRC रिकॉर्ड सिर्फ एक कंप्यूटर जनरेटेड स्टेटमेंट था, जिस पर इमेज आईडी और “Generated by DLDD Version 6.0” लिखा हुआ था। कोर्ट ने कहा की भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65B के तहत जरुरी सर्टिफिकेट के बिना ऐसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की कोई कानूनी अहमियत नहीं रह जाती। इसके लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर(2014) मामले का भी हवाला दिया।
साल 2017 का स्कूल सर्टिफिकेट भी अमान्य कर दिया गया, क्योंकि याचिकाकर्ता इसे जारी करने वाले हेडमास्टर को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश नहीं कर सके और न ही स्कूल का एडमिशन रजिस्टर पेश किया गया।
जमीनी कागज़ात और वोटर लिस्ट में मिली बड़ी खामियां
1973 के जमीन खरीद के दस्तावेज को भी कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया, क्योंकि यह साफ़ नहीं हो पाया की दादा की जमीन उनके कानूनी वारिसों को क्यों नहीं मिली। कोर्ट ने कहा की जमीन के मालिकाना हक़ की जानकारी देने वाला कोई भू-राजस्व रिकॉर्ड भी पेश किया गया।
वोटर लिस्ट में भी बड़ी गड़बड़ी मिली। परिवार जे एक सदस्य की उम्र साल 1979 की वोटर लिस्ट में 25 साल दर्ज थी, जबकि साल 1989 की लिस्ट में यही सिर्फ 29 साल थी। यानि दस साल में उम्र सिर्फ चार साल ही बढ़ी हुई दिखाई गई। कोर्ट ने यह भी पाया की कुछ नाम बिना किसी सबूत या दलील के वोटर लिस्ट में शामिल कर दिए गए थे।
PAN Card , Voter ID नागरिकता का सबूत नहीं: Guwahati High Court
कोर्ट ने साफ़ कहा की यह कानूनी तौर पर तय बात है की पैन कार्ड और EPIC नागरिकता का सबूत नहीं होते। अदालत ने यह भी कहा की याचिकाकर्ता अपने पैन कार्ड को आयकर विभाग के रिकॉर्ड से सही साबित नहीं कर सके। कोर्ट ने मन की नाम के मामूली अंतर होने से नागरिकता का दवा ख़ारिज नहीं होता, लेकिन याचिकाकर्ता को यह साबित करना ज़रूरी है की उनका अपने पूर्वजनों से लगातार और भरोसेमंद संबंध रहा है, जो तय तारीख से पहले भारत में मौजूद थे।
सभी दस्तावेजों और गवाही ही जाँच करने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फारेनर्स ट्रिब्यूनल के 28 फरवरी 2019 के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं पाई। कोर्ट ने अमीनुल हक़ की याचिका ख़ारिज कर दी और ट्रिब्यूनल के फैसले के मुताबिक आगे की कार्रवाई करने का आदेश दिया।
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