Live-In Relationship India: अलग धर्म के लोग साथ रह सकते हैं? Court ने दिया जवाब
Live-In Relationship India: देश में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, खासकर जब मामला अलग-अलग धर्म के कपल्स यानी इंटरफेथ रिलेशनशिप का हो। क्या ऐसे लोग बिना शादी के साथ रह सकते हैं? क्या यह कानूनन सही है? इन सभी सवालों पर अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ और अहम टिप्पणी की है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि दो अलग-अलग धर्मों के लोग अगर अपनी मर्जी से, आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें रोका नहीं जा सकता। कानून ऐसे रिश्तों को अपराध नहीं मानता, बल्कि संविधान उनके अधिकारों की रक्षा करता है।
“हम उन्हें हिंदू-मुसलमान नहीं, दो बालिग इंसान मानते हैं”
यह टिप्पणी जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने एक इंटरफेथ कपल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कपल ने कोर्ट में गुहार लगाई थी कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा है और पुलिस उनकी मदद नहीं कर रही।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि वह इस कपल को उनके धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखता है, जो अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि अगर दो बालिग लोग खुशी से साथ रहना चाहते हैं, तो यह उनका अधिकार है और इसमें किसी को दखल देने का हक नहीं है।
संविधान देता है साथ रहने का अधिकार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया, जो हर व्यक्ति को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार देता है।कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने की आजादी है। यह सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि उसका मौलिक अधिकार है।
यानी धर्म, जाति या समाज की सोच से ऊपर उठकर, कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है।
कोई भी नहीं कर सकता दखल
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जब कानून दो लोगों को साथ रहने की इजाजत देता है, तो फिर कोई भी—चाहे परिवार हो, समाज हो या राज्य—उनके इस फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
अगर ऐसा होता है, तो यह सीधे-सीधे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।
राज्य की जिम्मेदारी क्या है?
कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक की सुरक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।
अगर कोई कपल अपनी जान या सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस करता है, तो प्रशासन का कर्तव्य है कि उसे सुरक्षा दे, न कि उसकी अनदेखी करे।
लेकिन एक शर्त भी है
हालांकि कोर्ट ने एक अहम बात भी साफ की। अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसने तलाक नहीं लिया है, तो वह किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता।
कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति की आजादी वहीं खत्म हो जाती है, जहां दूसरे व्यक्ति का कानूनी अधिकार शुरू होता है। यानी शादीशुदा व्यक्ति के मामले में उसके जीवनसाथी के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
समाज बनाम कानून: बढ़ती बहस
यह फैसला एक बार फिर समाज और कानून के बीच के अंतर को दिखाता है। जहां समाज अभी भी ऐसे रिश्तों को लेकर संकोच करता है, वहीं कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है।
इंटरफेथ लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मुद्दे आज के समय में तेजी से बढ़ रहे हैं, और ऐसे में कोर्ट का यह रुख काफी अहम माना जा रहा है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है—
दो बालिग लोगों की पसंद सबसे ऊपर है।
धर्म या समाज की सीमाओं से ऊपर उठकर, हर व्यक्ति को अपने जीवन का फैसला खुद करने का अधिकार है। हालांकि, इस आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है, खासकर जब बात शादीशुदा रिश्तों की हो। कुल मिलाकर, यह फैसला बदलते भारत की तस्वीर दिखाता है, जहां रिश्तों की परिभाषा भी अब नई दिशा ले रही है।
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