UN में पाकिस्तान की ‘चुप्पी’ से मचा भूचाल: ईरान मुद्दे पर वोटिंग से दूर रहना इस्लामाबाद को कितना भारी पड़ेगा?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान को लेकर हाल में हुई वोटिंग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान के रुख को लेकर हो रही है। पाकिस्तान ने न तो ईरान के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया और न ही उसका खुलकर विरोध किया। उसने वोटिंग से दूरी बनाकर एक तरह से बीच का रास्ता अपनाया, लेकिन यह फैसला अब उसके लिए बड़ी परेशानी बनता दिख रहा है।
यह मामला तब सामने आया जब खाड़ी देश बहरीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव का मकसद ईरान पर दबाव बनाना था, ताकि वह होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखे और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही में कोई बाधा न डाले। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होती है।
पाकिस्तान क्यों रहा वोटिंग से दूर?
इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर जब वोटिंग हुई, तो 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में शामिल था, जिन्होंने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया। पाकिस्तान का यह कदम उसकी कूटनीतिक दुविधा को दिखाता है।
दरअसल, पाकिस्तान इस समय कई ताकतों के बीच फंसा हुआ है। एक तरफ अमेरिका है, जिससे उसे आर्थिक मदद, कर्ज और सैन्य सहयोग की जरूरत रहती है। दूसरी तरफ सऊदी अरब और बहरीन जैसे खाड़ी देश हैं, जिन्होंने कई बार आर्थिक संकट के समय पाकिस्तान की मदद की है।
वहीं, तीसरी तरफ पड़ोसी देश ईरान है, जिसके साथ पाकिस्तान के रिश्ते जटिल लेकिन बेहद संवेदनशील हैं। दोनों देशों के बीच गैस पाइपलाइन परियोजना और सीमा सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं। ऐसे में पाकिस्तान किसी एक पक्ष को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता।
अमेरिका और अरब देशों की नाराजगी
पाकिस्तान का यह तटस्थ रवैया अमेरिका और खाड़ी देशों को बिल्कुल पसंद नहीं आया। अमेरिका इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए काफी प्रयास कर रहा था। ऐसे में पाकिस्तान का वोटिंग से दूर रहना अमेरिका को धोखे जैसा लग रहा है।
खाड़ी देशों, खासकर बहरीन और सऊदी अरब ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका मानना है कि ईरान होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जो पूरी दुनिया के लिए खतरा बन सकता है।
इन देशों को उम्मीद थी कि पाकिस्तान, जो खुद को मुस्लिम दुनिया का अहम देश बताता है, उनके साथ खड़ा होगा। लेकिन पाकिस्तान के इस रुख ने उनके भरोसे को झटका दिया है।
रूस और चीन का अलग नजरिया
इस पूरे मुद्दे पर रूस और चीन का रुख भी अलग रहा। रूस ने कहा कि वह समुद्री रास्तों की स्वतंत्रता का समर्थन करता है, लेकिन यह प्रस्ताव एकतरफा था और इससे शांति वार्ता प्रभावित हो सकती थी।
चीन ने भी इसी तरह की बात कही। उसका कहना था कि वह होर्मुज को बंद करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन प्रस्ताव में पूरे हालात की सही तस्वीर पेश नहीं की गई थी। इसलिए वह इसका समर्थन नहीं कर सकता।
पाकिस्तान के लिए बढ़ती चुनौतियां
पाकिस्तान का यह फैसला अब उसके लिए कई तरह की मुश्किलें पैदा कर सकता है।
अमेरिका का दबाव बढ़ सकता है
अमेरिका पहले ही ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है। ऐसे में पाकिस्तान की यह नरमी उसे अमेरिका की नजर में कमजोर बना सकती है। भविष्य में पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध या अन्य दबाव बढ़ सकता है।
खाड़ी देशों से दूरी का खतरा
सऊदी अरब और बहरीन जैसे देश पाकिस्तान के बड़े आर्थिक सहयोगी रहे हैं। अगर उन्हें यह महसूस होता है कि पाकिस्तान संकट के समय उनके साथ नहीं खड़ा हुआ, तो वे निवेश और आर्थिक मदद कम कर सकते हैं। इसका सीधा असर पहले से कमजोर पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था पर पड़ सकता है।
ईरान से भी पूरी तरह भरोसा नहीं
पाकिस्तान को लग सकता है कि उसने वोटिंग से दूर रहकर ईरान को खुश कर दिया, लेकिन हकीकत इससे अलग है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा मुद्दे पहले से ही तनाव का कारण बने हुए हैं। ऐसे में ईरान भी पाकिस्तान पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता।
ये कूटनीति थी या कमजोरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह कदम उसकी मजबूरी और कमजोरी को दर्शाता है। वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि उसे किस पक्ष का समर्थन करना चाहिए।
आज की वैश्विक राजनीति में देश अक्सर स्पष्ट रुख अपनाते हैं, लेकिन पाकिस्तान ने बीच का रास्ता चुनकर खुद को मुश्किल स्थिति में डाल लिया है। यह रणनीति अल्पकाल में सुरक्षित लग सकती है, लेकिन लम्बे समय में नुकसानदेह साबित हो सकती है।
वैश्विक असर और आगे की स्थिति
होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई होती है। अगर यहां तनाव बढ़ता है या रास्ता बंद होता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
खाड़ी देशों का कहना है कि अगर ईरान को अभी नहीं रोका गया, तो भविष्य में कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़कर समुद्री मार्गों को बंद कर सकता है। इससे वैश्विक व्यापार और सुरक्षा दोनों पर खतरा बढ़ जाएगा।
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि
पाकिस्तान का यूएन में वोटिंग से दूर रहना एक साधारण फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है। इसने यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान इस समय अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच फंसा हुआ है और फ़िलहाल कोई स्पष्ट दिशा तय नहीं कर पा रहा है।
हालांकि उसने किसी एक पक्ष को नाराज होने से बचाने की कोशिश की, लेकिन अब वह खुद ही कई देशों की नाराजगी झेल रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान अपनी इस कूटनीतिक स्थिति को कैसे संभालता है और क्या वह अपने रिश्तों को संतुलित रख पाता है या नहीं।
