Mamata Banerjee Under Pressure? TMC MP Sukhendu Sekhar Roy Resigns
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) लगातार अंदरूनी संकट से जूझ रही है। चुनावी नतीजों के बाद पार्टी में शुरू हुई नाराजगी अब केवल विधायकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर संसद तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। इसी बीच TMC के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब TMC पहले से ही अंदरूनी बगावत, नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों और संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा सिर्फ एक नेता के पार्टी छोड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह TMC के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत भी हो सकता है।
चुनावी हार के बाद बढ़ा असंतोष
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद TMC के कई विधायक और नेता पार्टी नेतृत्व से नाराज दिखाई दिए। कई नेताओं ने संगठन की कार्यप्रणाली और फैसलों पर सवाल उठाए। कुछ विधायकों ने खुलकर नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा भी खोला। ऐसे माहौल में सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा पार्टी के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है।
कौन हैं सुखेंदु शेखर रॉय?
सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक जाना-पहचाना नाम हैं। उन्हें TMC के सबसे अनुभवी और रणनीतिक नेताओं में गिना जाता है। लंबे समय तक उन्होंने पार्टी की संसदीय रणनीति तैयार करने और संसद में पार्टी का पक्ष मजबूती से रखने में अहम भूमिका निभाई।
कांग्रेस से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
सुखेंदु शेखर रॉय का जन्म 5 अप्रैल 1949 को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में हुआ था। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की और 1968 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी माने जाते थे।
ममता बनर्जी के साथ TMC में शामिल हुए
1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब सुखेंदु शेखर रॉय भी उनके साथ नई पार्टी में शामिल हो गए। शुरुआत से ही वह ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे।
*वकालत से संसद तक का सफर
राजनीति के साथ-साथ उन्होंने कानून के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। 2009 से 2011 तक वह कलकत्ता हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रहे। कानूनी मामलों और संसदीय प्रक्रियाओं पर उनकी मजबूत पकड़ के कारण पार्टी में उनका कद लगातार बढ़ता गया।
*2011 में राज्यसभा पहुंचे
2011 में पश्चिम बंगाल में TMC की ऐतिहासिक जीत के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया। इसके बाद वह लगातार तीन कार्यकाल तक राज्यसभा सांसद रहे। संसद में उन्होंने TMC के चीफ व्हिप, डिप्टी लीडर और प्रमुख संसदीय रणनीतिकार के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
*राष्ट्रीय राजनीति में बनाई अलग पहचान
संसद में उन्होंने केंद्र सरकार, संघीय ढांचे, राज्यपालों की भूमिका और बंगाल से जुड़े मुद्दों पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रखा। 2022 में उन्हें TMC के मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ का संपादक भी बनाया गया था।
*पार्टी नेतृत्व से बढ़ते मतभेद
पिछले कुछ वर्षों में सुखेंदु शेखर रॉय और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे थे। खासकर आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज मामले के दौरान उन्होंने पार्टी लाइन से अलग राय रखी थी। इसके बाद उन्हें राज्यसभा में पार्टी के चीफ व्हिप पद से भी हटा दिया गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही मतभेद धीरे-धीरे गहराते गए और अंततः उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला किया।
*इस्तीफे के क्या हैं राजनीतिक मायने?
सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब ममता बनर्जी दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठकों और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में संसद में पार्टी के सबसे अनुभवी चेहरों में से एक का इस्तीफा TMC की छवि और संगठनात्मक मजबूती दोनों पर असर डाल सकता है।
यह भी माना जा रहा है कि यदि पार्टी के भीतर असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले दिनों में और बड़े नेता भी अलग रास्ता चुन सकते हैं।
*क्या यह सिर्फ एक इस्तीफा है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा केवल व्यक्तिगत फैसला है या फिर TMC के भीतर चल रहे बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत। जिस तरह चुनावी हार के बाद पार्टी में लगातार असंतोष सामने आ रहा है, उससे यह साफ है कि TMC इस समय अपने सबसे कठिन दौर में से गुजर रही है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इस संकट से पार्टी को कैसे बाहर निकालती हैं और क्या सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा TMC में किसी बड़े राजनीतिक पुनर्गठन की शुरुआत साबित होता है।
